आत्म कथा खण्ड 1 | Aatma Kathaa Khand 1

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Aatma Kathaa Khand 1  by हरिभाऊ उपाध्याय - Haribhau Upadhyay

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हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन के भवरासा में सन १८९२ ई० में हुआ।

विश्वविद्यालयीन शिक्षा अन्यतम न होते हुए भी साहित्यसर्जना की प्रतिभा जन्मजात थी और इनके सार्वजनिक जीवन का आरंभ "औदुंबर" मासिक पत्र के प्रकाशन के माध्यम से साहित्यसेवा द्वारा ही हुआ। सन्‌ १९११ में पढ़ाई के साथ इन्होंने इस पत्र का संपादन भी किया। सन्‌ १९१५ में वे पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आए और "सरस्वती' में काम किया। इसके बाद श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के "प्रताप", "हिंदी नवजीवन", "प्रभा", आदि के संपादन में योगदान किया। सन्‌ १९२२ में स्वयं "मालव मयूर" नामक पत्र प्रकाशित करने की योजना बनाई किंतु पत्र अध

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(३) के बाल-विवाहं ७ || 5 े क जा अआलचाहता दे कि यह प्रकरण मुझे न लिखना पड़े तो व अच्छा; परन्तु इस कथा में मुझे ऐसी कितनी ही कड़वी घूंटें पीनी पड़ेंगी । सत्य के पुजारी होने का दावा करके में . इससे केसे बच सकता हैँ ? यह लिखते हुए मेरे छृदय को बड़ी व्यथा होती है कि १श्बर्ष की उम्र में मेरा विवाह हुआ । आज में अपनी आंखों के सासने १०२-*३ वष के बच्चों को देखता हैँ ओर जब म॒भे अपने विवाह का स्मग्ण हो आता हैं, तब सुझे अपने पर दया आने लगती है ध्योग उन बच्चों का इस बात के लिए बधाई देने की इच्छा हाती है कि वे मेरी हालत से अब तक बचे हुए हैं | तेरह साल की उम्र में हुए मेरे बिबाह के समथ्वन में एक भी नेतिक दलील सेरे दिसास में नहीं समा सकती | पाठक यह न समझे कि में सगाई की बात लिखा रहा हैँ । सराइ का तो अथ होता हैं दो लड़के लड़कियों के विवाह करने का इक़तरार, जिस मां-बाप आपस में ही कर लेते हें | सगाई दृट सकती हैं । सगाई हो जाने पर यदि लड़का मर जाय तो कन्या कक,




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