अग्निपुराणम् | Agni Puranam

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Agni Puranam by श्री महर्षि वेदव्यास - shree Maharshi Vedvyas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द्वितीयो5ध्यायः मत््यावताखणनम । वशिष्ठ उचाच । त्स्थादिरूपिणंविष्णुं ब्रृहिखर्गा दिकारणम्‌। पुराणंत्रह्म चाग्नेयं यथा विष्णो:पुराश्रतम्‌ अग्निरुवाच | (त्स्यावतारं वक्ष्येएह॑ चशिष्ठ | शएणु थे हरे: । अवतारक्रिया दुष्टनष्ट्ये सत्पालनाय हि 1सीद्तीतकव्पान्ते ब्राह्मो नैमित्तिकोलय: | सम्रुद्रो पप्लुतास्तत्र लोका भूरादिकामुने परनुवेबस्वतस्तेपे तपो वे भुक्तिमुक्तमे । एकदा ृतमालायां कुर्बतो जलतपंणम्‌॥ ४॥ ! सस्याञ्ञव्युदके मत्स्यःस्घट्प एको 5स्यपद्यत । क्षेत्रकामं जले प्राह नमां क्षिप नरोत्तम ! ग्राह्नद्भ्यों भय॑ मेप्य तच्छ त्वा कलशे5क्षिपत्‌ । स॒तु वृद्धः पुनमेत्स्यः प्राह त॑ देहि मे बृहत्‌ ॥ ६ ॥ स्थानमेतद्वच: श्रुत्वा राजाइथोदश्नेःक्षिपत्‌ । तत्र वृद्धो पत्रवीद्‌ भूप॑ पृथु देहि पदंमनो सरोधरेपुनः क्षिप्तो चतृधे तत्‌ प्रमाणवान । ऊचचेदेहि बृहत्‌ स्थान प्राश्षिप्चाम्बधोततः लक्षयो जनविस्तीण: क्षणमात्रेण सोष्भवत्‌ | मत्स्य॑ तमहुत॑ दृष्मा बिस्मितः प्रात्रवोन मनुः ॥ ६॥ कोभवान्ननु वे विष्णु्नारायण नमो5स्तु ते। माययाभोहयसि मां किमरथ्थ त्व॑ं जनादन मनुनोक्तो ः्रवीन्‍्मत्स्थों मनु वे पालने रतम्‌। अवतीर्णों भवायास्य जगतो दुष्नष्टये सप्तमे दिवसे त्वब्धि: प्रावयिष्यति वे जगत । उपस्थितायां नावि त्वं घीजादीनि विधाय व ॥ १२॥ सप्तषिभिःपरिवृतों निशां ब्राह्मीं चरिष्यलि | उपस्थितस्य मे शड़े निबध्नीहि महाहिना इत्युतधान्तदथे मत्स्यो मनुः कालप्रतीक्षकः । स्थितः सप्नुद्र उद्देले वावमारुरुहे तदा ॥ एक/श्टड्धरोमत्स्यो हैमो नियुतयोजनः । वाघस्ववन्ध ततू शड्ढे मत्स्याख्यश्नपुराणक्त्‌




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