बेईमानी की परत | Beimani Ki Parat

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Beimani Ki Parat by हरिशंकर परसाई - Harishankar Parsai

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२५ प्कवा है ' भदालत से दी जाने वाली मियाद को तरह यह समय निकालना हीवा है । पर इसमें एक जबरदस्त खतरा है--भगर कभी कही मत्यक मामना-सामना हो गया तो साहुकार गर्दन पकड़कर कहेगा, वषों साहब, पसेखा जाने के इरादे हैं क्या ? भव तो वह रास्ता ही छोड दिया । सबसे मुश्किल टालना मकान मालिक का होता हैं। दूसरों को टान्नने के जिए प्र।प घर छोड सकते हैं, घर पर न मिलने का इतशास कर सकते हैं। पर दिन-मर कहो भी रहें, रात को तो घर लौटना ही पड़ता है। सबिरे नींद खुलने के पहिले भगर मकान मालिक भा गया तो सुन्दर सपने तक नष्द हो जाते हैं। कहते हैं भोर का सपना सच्चा होता है। धगर सुबह प्रादमी भपना तिमंजिला मकान बनवा रहा हो, पूरा बन चुका हो, सिर्फ रंग-बिरंगी पुताई रह गयी हो, इसी समय प्रगर मकान मालिक भाकर जया दे, तो तिमजिला भवन एक क्षण मे ध्वस्त हो जाय। चाहे नींद हराम हो, पर आदमी को भपने सपने बरवाद नहीं होने देना चाहिए) कर्ज में पहिले झ्रिकक होती है, तगादों से श्षमें भाती है, रारता छोड़ने में ग्लानि होती है । ये प्रपरिपकव मनुष्णता के लद्वाण हैं। परिपवतता तब श्राती है जब प्रादभी इनमें गये का अनुभव करता है । हमारा स्पाल बनता जा रहा है कि उघारी कोई दँवी व्यापार है। उधार का माल भकद के माल से भ्रधिक पवित्र झौर महत्‌ होता है। मुदामा जब कृष्ण मे मिलने गये, तो जो पाव-भर चावल मेंट के लिए ले गये थे, उन्हें प्राह्मणी पढ़ोप्तिन से उघार लाई थी। उन उघारी के चावलों को जब शृष्ण में छापा, तो तुरन्त दो लोकों का राज दे दिया। देवतामों में तो उधारी को प्रथा इस हृद तक थी कि मारद विष्णु से उनका चेहरा ही उधार माँग कर से गये थे । पट उस मुबनमोहिनी ने रहस्य जात लिए प्रौर कर्दार के ददले साहुकार के गले में जयमाला डाल दी । सुन्दरोंझभी स्यावहारिक भी हो जाती है । शायद उधारी कोई परम पवित्र सोकोत्तर प्रदृत्ति है जो महान प्रात्मापों में निवास करती है। 'गालिव परिणाम जानते हुए भो गरजे की मय पीते ये -.




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