अछूत एक सामाजिक नाटक | Achhut Ek Samajik Natak

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutAanandiprasad Shrivastav
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
140
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about आनन्दिप्रसाद श्रीवास्तव - Aanandiprasad Shrivastav
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)दृश्य हे शअचछ्चसकते हैं ? मन्दिर भी अशुद्ध हो जायगा, ठाकुर जी भी
अशुद्ध द्वो जायेंगे ।अछूत-पुजारी, तोहरे याव परित है हमका भीतर
ज्ञाय देव । ठाकुर जी तो परम पवित्र शरह, ऊ कैसे अशुद्ध
दोइ जैदे । महराज तोहार बुद्धी मग्यी गै है फा ? ठाकुर जी
जब राम रहेन तबकी वात याद फरो, शहद निषाद का छाती
से लगाइन, शवरी के जुठ वैर प्राइन रहा । तब नाही
भये रहेन अशुद्ध, अ्रव अशुद्ध दोइ जैहे । महरोज, ईशुर
आगगिड से गये बीते श्रद्दे । अआर्गिड तो पवित्र मानी ज्ञात
है ।ओहमा चाहे जौन पर्डि जाय सब पवित्र, तो का ईशुर
हमरे छुये से अशुद्ध द्वोइ दे ? कैसी चात करत ही महराज २पुजारी--अबे भागता है यद्दा से कि चदस करता है २
छुझूको मैं भीतर नहीं जाने दूगा 1अछूत-जो मैं पूजा न करिहदी, तो मोर गदेलवा फिर
बिमार पड़ि जाई | मोका पुजा कर लेय देव ।[गाता है ]
मोरे हैं. भगवान,
तोरे. हैं भगवान,( १५ )
User Reviews
No Reviews | Add Yours...