लघु - सिद्धान्त - कौमुदी भैमीव्याख्या भाग - 2 | Laghu Siddhant Kaumudi Bhaimivyakhya Bhag - 2

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५] भैमीव्यास्ययोपेतायां लघु-कौमुधाम्‌ [लघु० | भू सत्तायाम्‌ ॥0॥ कत्‌ विवक्षायां 'भू+ल्‌' इति स्थिते-- प्र्थ:--भू धातु “सत्ता! अर्थ में प्रयुक्त होती है। कर्त्‌ विवक्षा में वत्तमानकाल में लेंट प्रत्यय होकर अनुवन्धों का लोप करने पर “'भू+-ल्‌ बना। अब इस अवस्था में अग्निमसूत्र प्रवृत्त होता है-- व्याप्या--अब जो धातु आरम्भ किये जा रहे हैं वे पाणिनिमुनिप्रणीत धातु- पाठ से चयन किये गये हैं । इन घातुओं को घातुपाठ में दस श्रेणियों में विभक्त किया गया है। यथा-- “स्वाद्यदादी जुहोत्यादिदिवादि: स्वाविरेध घ। तुदादिध्च रुधादिइ्व तन-फक्रयावि-चु रादयः ॥।” (१) म्वादिगण, (२) अदादिगण, (३) जुहोत्यादिगण, (४) दिवादिगण, (५) स्वादिगण, (६) तुदादिगण, (७) रुघ्रादिगण, (८५) तनादिगण, (६) क्रभादिगण, (१०) चुरादिगण । इन गणों का नामकरण उन में आने वाली प्रथम धातु के आधार पर किया गया है। यथा--प्रथमगण का नाम उप्रमें आनेवाली प्रथम घातु “भू के फारण म्वादिगण हुआ है । इसी प्रकार 'अद्‌' के कारण अदादिगण आदि जानें । घातुपाठ के भादि में सर्वप्रथम “भू” रखने का अभिप्राय भद्भूल करना है, क्योंकि “भू शब्द ओं भूभु व: स्व” इन महाव्याहृतियों के आदि में प्रयुकत है तथा परब्रह्म का वाचक भी है | धातुओं के आगे सप्तमीविभक्ति द्वारा जिस अर्थ का निर्देश किया जाता है, केवल वही उनका अर्थ नहीं हुमा करता । धातुओं के अनेक अर्थ ह्वोते हैं, यहां तो केवल प्राय: प्रसिद्ध अर्थ ही दिया जाता है। द्वोप अर्थ विस्तृत वाह्ममय से समूह होती हैं और वह समूह कभी भी समुदितरूपेण देखा नहीं जा सकता । क्योंकि अपान्तर क्रियाएं क्षणिक होती हैं, क्षण भर रह कर नष्ट हो जाती हैं। जब धूसरी अवान्तर किया प्रारम्म होती है तव तक पहली नप्ट हो चुकी होती है । इसी प्रकार जब तीपरी चौथी अवान्तर क्रियाएं प्रारम्म होती हैं तव तक पूर्व पूर्व क्रिया नप्ट हो चुकी होती है, अत्त: उनका समूह कभी भी एक काल में नहीं वन सकता । जब समूह ही नहीं तो उसका नाम क्रिया कैसे ? इसका उत्तर अत्यन्त वुद्धिमत्ता से कारिका में 'बुढथा - प्रकल्पितापष्मेद:/ शब्द जोड़ कर दिया गया है। अर्थात्‌ यद्यपि हम क्षण-वत्तिनी क्रपाओं के समूह को किसी एक काल में इकट्ठा प्रत्यक्ष नहीं कर सकते तथापि अपनी बुद्धि द्वारा उनके समूह को समझ सकते हैं । बस बुद्धि द्वारा उनके समूह फी कल्पना कर अभेद समझ कर उप्तकी ही क्रिया ! सञज्ञा की जाती है। (वेयाकरणभूषणसार के भमीभाष्य से उद्धुत)




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