प्रिया | Priya

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Priya by दीप्ति खण्डेलवाल - Deepti Khandelwal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भो बढां था जाने कितने सुझ-जैंसे 'अभिमन्दु' अनाम होते हैं, उनके चक्रब्यूट, अद्श्य,*उनके युद्धों दाग कोई इतिहास नहीं लिखा जाता* *चक्र- अ्यूडू में वे अनाम युद्ध मी करते हैं'“*और निन्यान्तरे श्रतिशत जिस मिट्टो से वे उठते हैं, उसी में मिल जाते हैं---चुपवाप 1 न उनका कोई इतिहास लिया जाता है. ने उनका कोई स्मारक बनता है***उनकी चिता की राख भी दस घूल में मिचकर रह जाती है।*। बावा बात-बात पर पौराणिक कयाओं के उदाहरण देते, इतिहास का उल्लेख करते, प्रिया को अपनी कहानी एक तन्मयता से, आत्म-विस्मृतन्से मुनाया करते । कान तक फैली आंखों को पूरा फैलाये प्रिया तन्‍्मयता से सुना कंसती | बावा के वर्षन चित्रात्मक हीते या प्रिया की आर्खें उन्हें चिन्नात्मक बना लेतीं***एक तन्मय चित्नात्ममता, नाना और नातिन को एकात्म कर देती 1 “तो बहू गोरा-उजला छोकरा रविश्वंकर प्रकृति से खिलदढ़ा था, शरारती, दंड । उसका सबसे पहला खेल था,पत्थर मार-मारकर गाव की पाती भर कर जाती हुई औरतों के घड़े फोड़ देना । रवि का गाँव इतना गरीब था कि प्रीतल कया कल्तसा कुछ के ही पास था, शेप के पास मिट्टी के घड़े ही थे । कभी निशाना चूक जाता, कमी उचट जाता, कभी सचमुच कोई घड़ा फूड जाता, तय कोई औरत रवि को जी भरकर गालिवां देती, कोई उसकी मां को भी,*““अपने हिस्से की गालिया तो वह इमली चूसते खा लिया करता, किन्तु माँ का नाम गाली के साथ सुनते ही होश खो बैठता' *इतना उद्दृड हो उठता कि माँ को गाजी देनेवाली का घड़ा बार-बार फोडतवा। घर पहुंचता तो माँ जी भरकर पीटती, बाहर निकलता तो पिटते-पिटते **बचता गजब की फुर्ती थी उसकी टागो मे, ऐसी दोड़ लगाता कि यह जा**वह जा” उसे पकड़ने दौड़ने वाले थक कर हांफने लगते, वह नदी-किनारे पहुंचकर बसी बजाने लगता' “नदी में मछलियां बहुत थीं** मछली वाली यंसी से वहु मछलिया पकड़ना सीख गया था'““धीरे-धीरे वह मद्धलियां बेचना भी सीख गया । मां मे/ पंडित जी को हाथ जोड़-जोड़ कर गाव की पाठशाला में उस खिलंदड़ उदृंढ छोकरे को पढ़ने वंठाया | सात वर्ष का वह लड़का 'क-्स-ग' भी नही जानता था, बीस से ज्यादा गिनती भी नही | उसके गोरे, मेले, घुल- भरे मुख पर चांटे जड़ती मां, एक दिन फूट-फूट कर रोने लगी घी--'बरे / रपू




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