श्रीअरविन्द के पत्र भाग दो और भाग तीन | Shri Arvindke Patra Bhag 2 Bhag 3

Shri Arvindke Patra Bhag 2 Bhag 3 by श्री अरविन्द - Shri Arvind

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कु भीअरविन्दके पत्र 1. वह विश्वात्मा और विश्वपुरुप हैं जो सभी वस्तुओं और जीवोंके अन्दर और पीछे विधमान है और जिससे और जिसमे विष्वके अन्दर सब कुछ प्रकट हो रहा हैं -- यद्यपि यह अभी अज्ञानके अन्दर होनेवाली अभिव्यक्ति है। 2 वह हमारे अन्दर विधमान हमारी निजी सत्ताके आत्मा और प्रभु है जिनकी हमें सेवा करनी है और जिनकी इच्छाको हमें अपसी सभी गतिविधियोंमें अभिव्यक्त करना सीखना है जिसमे कि हम अज्ञानसे बाहर निकलकर ज्योतिमें वद्धित हो सकें । 3 भगवान्‌ पसात्पर सत्ता और आत्मा हैं, समस्त आनन्द और ज्योति और दिव्य ज्ञान तथा शक्ति है. और उसी उच्चतम भागवत सत्ता और उसकी ज्योतिकी ओर हमे ऊपर उठना हैं एच उसके सत्पको अधिकाधिक अपनी चेतना और जीवनमें नीचे उतार लाना है। सामान्य प्रकृतिमे हम अज्ञानमें रहते है और भगवासुकों नहीं जानते । साधारण प्रकृतिकी शक्तियां अदिव्य शक्तियां है क्योंकि वे अहंकार, कामना और अचेतनताका एक पर्दा वुनती है जो भगवान्‌को हमसे ढक देता है। जो उच्चतर और गभीरतर चेतना जानती और ज्योतिर्मपी रूपसे भगवान्‌में निवास करती है उसमें जानेके लिये हमें निम्नतर प्रकृतिकी शक्तियोसे छुटकारा पाना होगा और भागवती शक्तिकी क्रिया- की कोर उदुघाटित होना होगा जो हमारी चेतनाकों भागवत प्रकृतिकी चेतनामें रूपांतरित कर देगी । भगवानुसम्बन्धी यही परिकल्पना है जिससे हमें आरम्भ करना होगा -- इसके सत्यका साक्षात्कार केवल तभी हो सकता है जव हमारी चेतना उदुघाटित और परिवर्तित हो जायगी । जे परात्यर, विश्वगत और व्यक्तिगत भगवानुके वीचका यह विभेद मेरा अपना आविष्कार नहीं है, न यह भारत या एशियाकी ही देशी उपज है -- यह, इसके विपरीत एक स्वीकृत यूरोपियन थिक्षा है जो कैथोलिक चर्चकी गुह्ा परम्परामें प्रचलित है, जहाँ यह श्रिमूत्तितपाांए)-- पिता, पुत्र और पविश्ात्मा - की प्रामाणिक व्याख्या है, और यह यूरोपीय गुह्दा अनुभवकों भी बहुत ज्ञात हैं। साररूपमें यह सभी आध्यात्मिक साधनाओंगें पायी जाती है जो भगवानूकी सर्वव्यापकत्ताकों स्वीकार करती है भारतीय चैदान्तिक अनुभवमें यह है और मुसलमानी योगमें है (केवल सुफी मतमें नहीं, बल्कि अन्य मतोंमें भी ) - मुसलमान लोग दो या तीन नहीं घल्कि भगवान्‌के बहुतसे स्तरोंकी वात भी कहते हैं और उनके वाद ही कोई परात्परतक पहुँचता है। स्वयं इस भावनाका जहांतक प्रश्न है, निश्चय ही देग और कालके अन्दर स्थित व्यक्ति गौर विष्व और जो कुछ इस विष्व-व्यवस्थाको या किसी भी विदव- व्यवस्थाको अतिक्रांत करता है, उसके बीच एक अन्तर है। एक वैश्व चेतना है जिसका अनुभव बहुतोंको हुआ है और जो अपने प्रसार और कर्ममें व्यक्तिगत चेतनासे एकदम




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