प्रगतिवाद एक समीक्षा | Pragativad Ek Samiksha

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Pragativad Ek Samiksha by धर्मवीर भारती - Dharmvir Bharati

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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एक समीक्षा २१ सबसे पहले पू्॑-क्रान्ति से क्रान्ति तक का' काल आता है।इस काक्ष में लेखकों में सर्वाहारा साहित्य की चेतना बहुत कम थी। उस समय लेखक श्रधिक तर व्यक्तिवादी थे ओर उन पर १. क्रांति तक. फ्रान्सीसी साहित्य का विशेष प्रभाव था। शध्बी (१३००-४८) शी के अन्त में ही समस्त यूरोपीय साहित्य में जो पतनोन्पुखी (डिकैडेणट) प्रश्ृत्तियाँ झा गई थीं उनका पूरा प्रभाव रूसी साहित्य. पर था । उस समय बालमान्ट, ब्र्‌ साव और सोलोगव मुख्य कवि थे और जैसा यारमोलिन्स्की ने अपने आधुनिक रूसी-काव्य-संग्रह में लिखा है, “थे लोग विदेशी आदर्शों से पूर्णतया अनुप्राणत थे और कई एक तो रपष्ट कहते ये कि आधुनिक कविता केबल बासी फ्रान्सीसी शोरबा है जो रूसी चूल्ददे पर गरम कर लिया गया है |” उसी फ्रांसीसी पतनोग्मुखता का स्पष्ट प्रभाव इस समय को इस कविता में भी मिलता है जिसे आलोचकों ने प्रतीकवादी कविता का नाम दिया है| समाज - विरोधी भावनाएँ, स्थापित नेतिकता के विरुद्ध बिद्रोइ, गुनादों से खेलने की प्रबल्ल प्यास श्र सेक्स की तृष्णा, यह इनकी कविता के मुख्य विषय थे | लेकिन फिर भी इस प्रतीकवादी कविता में हर लैखक की अपनी अलग शैली थी, श्रपपी अलग धारा थी | इनकी कविताओं में उस समय तक सौन्दर्यानुभूति ही मुख्य पूज् था| लेकिन ये उस समय की प्रगतिवादी और उन्नतिशील प्रश्नत्तियों से अलग हो गये थे और उनमें से हरेक एक निराश पैगम्बर था। छनका निराशाबाद और व्यक्तिवाद कित सीमा तक पतनोमख्मुख हो चुका था इसका बहुत विचित्र उदाहरण प्रसिद्ध प्रतीकवादी कवि श्रलेक्जेरडर डोब्ुछ्ुबब के जीवन से मिलता है । वह भी फ्रान्सीसी डिकैडैन्ट स्कूल से प्रभावित थ७ और वास्तविक जीवन से दूर बोदलेयर के द्वारा बताए, हुए किम स्वर्ग (087/9019 87४110190]8) में रहने में विश्वास करता था | उसने ताबूत की शकक्‍ल' का एक कमरा बनवा रक्खा था।




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