साहित्यालोचन | Sahityaa Lochan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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5५ “४. कसा का िवचनलबाई, चौडाई और मुटाई होती है। बास्तुकार अर्थात भवन- नमिम्मोण-क्तो और मर्तिकार जो अपना कौशल डिय्पाने के लिये मूत्त आधार के पर्वोक्त तीनो शुर्खों का आश्रय तेना पडता है परतु चित्रकार को अपने चित्रपट के लिये लवाई और चोडाई का ही आधार लेना पढता है, मुटाई तो चित्र मे नाम भात्र को होती दे । (तापय यह कि ज्यों ज्यों हम ललित कलाओ में उत्तरोत्तर उत्तमता की ओर बढते हैं, त्यो त्यो मू्ते आधार का 'परित्याग होता जावा है ) चित्रकार अपने चित्रपट पर किसी सूरत पदार्थ का श्रतिबियर अकित कर देना है, जो असली वस्तु के रूप रग आदि के समान ही देस पडता है । अप सगीत के विषय में विचार कीजिए । संगीत में नांद का परिमाण अ्थान्‌ स्वरों का आरोह या अबरोह ( उतार चढ़ाव॑ ) ही उसका मूर्त आधार होता है। उसे छुचार रूप में व्यवस्थित करने से भिन्न मिन्चन रसो और भावों का आउिममाय होता है | अतिम अर्थाव सर्वोच्च स्थान काव्य कला का है । उसमें) मूत्त आधार की आय'्यक्ता.ही नहीं होती । उसका प्राहुर्भाप'अउइ-समहो या वास्यों से होता है, जो सनुप्य के मानसिक ....आार्वो ऊ. थोतक दोते है ।( काउय में जब -फेयल अर्थ फ्री रम- शीयता रहती है, तय तो मृत आधार का आस्तिल् नहीं रहता, पर शब्द की रमणीयता आने से संगीत के सदश ही साद- सौंदर्य रूप मर्त॑ आधार की_ उत्पत्ति हो_ आाती.. हें । | भारतीय ऋाव्य-फला से पाश्चात्य काव्य-कला की अपेक्षा नाद रूप भूर्त आधार की योजना अधिक रहती है। पर यट अर्थ की स्म- शीयता के समान्‌ काव्य का अनिवाय अग नहीं. है। (सर्व की नहकि




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