प्रकृति भी मुखर हो उठी | Prakrati Bhi Mukhar Ho Uthi

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Prakrati Bhi Mukhar Ho Uthi by मुनिज्ञान -munigyan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ६ ) कलम औओऔर कागज अपने ऊपर आती हुई करूम को देखते ही कागज ने कहा--जब भी तुम आती हो, मुर्के सिर से लेकर पेर तक काले रंग से रंग देती हो । मेरी सारी शुक्कता और ह्व- च्छता को विनष्ट कर देती हो । कलम ने कहा-देखो, मै तुम्हारी शालीनता-स्वच्छता भंग नही कर रही हूँ | बल्कि तुम्हारी उपादेयता मे निखार ला रही हूँ । जव तुम्हे मै अक्षरों की रगीवतता से भर देती हूँ तो छोग तुम्हे सुरक्षित रखते है। समभदार व्यक्ति की हृष्टि में कोरे कागज का कोई विशेष महत्व नहीं होता । यदि इसमे कुछ न कुछ लिखा होता है तो सुज्ञ व्यक्ति श्रव- इश्य उसे उठाता है और पढ़ने की कोशिश करता है तो भाई तुम्हारे ऊपर जितना अधिक लेखन होगा । तुम्हारी उत्तनी ही अधिक उपादेयता बढ़ती जाएगी । करूम की सत्य वात को, कागज ने सह स्वीकार कर ली । ऊपरी कालेपन या गोरेपन का इतना कोई महत्व नहीं है । महत्व तो उसका है कि उसके अच्तरंग में उप- योगी वस्तु क्‍या है ? |]




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