संक्षिप्त महाभारत | Sankshipt Mahabharat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( २३ )पृष्ट-संख्या५०२-सकाम भक्तोंकी विभिन्न देवताओंके प्रति भक्ति४०३-अन्तकालमें एकाक्षर ब्रह्म (प्रणव) का उच्चारण करते हुए उसके अर्थरूप निर्मुण भ्रह्मके चिन्तनसे परम गतिकी प्राप्ति४५०४-अनन्यभावसे चिन्तन करनेवाले भक्तके लिये भगवान्‌की सुलमता ..४०४-राक्षसी (क्रोष), आसुरी (लोभ) और मोहिनी (काम) प्रकृति एवं आसुरी सम्पदा- से युक्त मनुष्य .५०६-ध्यानपूर्वक भगवान्‌के नाम-गुणोका कीर्तन तथा उन्हें प्रणाम करनेवाले भक्त५०७-भगवानद्वारा निष्काममावसे नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवाले अनन्य भक्तका योग- क्षेमवहन५०८-मंगवान्‌का भक्तद्वारा प्रेमपूर्वक अपंण किये हुए पत्र, पुष्प, फल और जलका भोग लगाना५०९-भोजन, हवन, दान और तप आदिका मगवानूकों अपंण५१०-परस्पर भगवत्तत्त्व बोध करानेवाले, प्रीति पूर्वक भजन करनेवाले और भगवत्कथामे लगे रहनेवाले भक्त .. ४५११-भगवत्तत्त्वके है वक्‍ता देवषि नारद, असित, देवल और थ्यास श५१२-नक्षत्रोमें चन्द्रमा और ज्योतियोमे सूर्यरुपमे भगवान्‌५१३-पुरोहितोमे बृहस्पति, सेनापतियोमे स्कन्द., और जलाशयोौमे समुद्रके रूपमे भगवान्‌५१४-महपियोमे भृयु, शब्दोमे ओकार, यज्ञोमें जपयज्ञ और स्थावरोमे हिमालयके रूपमे भगवान्‌५१५-दत्योमे प्र्माद, मृगोमे मृगेन्द्र और पक्षियोमे गरुडके रूपसे भगवान्‌ .५१६-शस्प्रधारियोमे श्रीरामके रूपमे भगवान्‌५१७-अर्जुनकी प्रार्थनासे भगवान्‌का पुनः सोम्य- मूतिधारण५१८-निराकारके साधनम वलेशोकी बहुलता तया अनन्यभावरो समुण भगवान्‌कों भजनेवाले भवक्‍्तोरा स्वय भगवान्‌द्वारा मृत्युरुप संसतार-समुद्से उद्धार५१९-जन्म, मृत्य, जरा और व्याधिस्प दुख४२०-सम्पूर क्षेत्रोमें एक ही आत्माका प्रकाश५२१-युणातीत महात्मा पुरुषइ्ररेश्२५६२५६२६६२७६२७६२७ ६२८६२९ ६२९श्रह३े०इ्रे४ ६३५ ६२६रेपृष्ट-संख्या५२२-आमसुरी सम्पत्तिसे युक्त मनुष्यता संग्रह कार्य ५२३-नरकके तीन द्वार--काम, क्रोध और सोम५२४-सात्तिक है 4008 देवारापना, राजसोरी मद्ापूजा और तामासोंडी प्रेतोपासना ५२५-कायकलेशप्रद घोर तप . -५२६-सान्विक, राजन और तामस भोजन .. ५२७-मात्तविक, राजस और तामस यज्ञ, ५२८-तसात्त्विक, राजन और तामस दान ५२९-अर्जुनका मोह-नाश .. ३०-युधिप्ठिरका भीष्म आदिके पास युद्धके लिये आज्ञा लेने जाना .. ब्ड ५३ १-युधिप्ठिरको भीष्मफा आशीर्वाद ५३२-युघिप्ठिरको द्रोणका आशीर्वाद ४३३-युधिप्ठिरको शपाचार्यका आशीर्वाद ५३४-युधिप्ठिरको द्ाल्यका आशीर्वाद ५३५-भीप्स और अरजजुनका युद्ध कर ५३६-घटोत्कच और अलम्बुपका युदढ_.. ५३७-भीष्म ओर दवेतका युद्ध--भीपष्मने इवेतफी इक्ति काट दी ग्ड ४३६५-दुर्पोघनका कौरव-वीरोंको संगठित होकर युद्ध करनेके लिये उत्साहित करना .. ५३९-भीमसेनके हायसे कलिज्जराज भानुमान्‌ और उसके हाथीका वध * ५४०-दुर्पोधनका भीष्मजीको उत्तेजित करना . . ५४१-मंगवान्‌ श्रीकृष्णणा चक्र लेकर भीष्मकों मारनेके लिये दोड़ना .. क ५४२-भीमसेनके द्वारा हाथियोंका संहार ५४३-विजयी पाण्डवोका भीमसेत और घटोत्कच- को भागे करके शिविरकी ओर लोटना . . ५४४-देवता और ऋषियोंका ब्रह्माजीसे मगवानुके विपयमे जिज्ञासा करना ५४५-दुर्गोधनका भीष्मजीसे भगवान्‌ इृष्णकी उत्पत्ति और स्थितिके विषयमें पूछना ५४६-द्रोघाचार्यका कौरवोकों रणमूमिमे अचेत अवस्थामे पढ़े देखना . है ५४७-भीमसेनक़े द्वारा दुर्पोधनकी पराजप ५४८-भीष्मका प्राणोकी बाजी सगाकर पाण्डवोसे लडनेकी प्रतिज्ञा | ५४९-अधश्वत्यामा और शियष्डीता युद्ध ५५०-मकुल-सहदेवकी मारसे मूछित' दत्यका मारथिके द्वारा युद्धक्षेत्रसे बाहर से जाया जाना . ह६३२९ ६४०६४० दर ध्ध्‌ दध१ 5४२ ६४3, ६४६ ६४७ डे ६४द ६४८ ६४० ६५०६५३ ६५६६श८ ६६१६६२ ६६२६६६ ६६८ ६६९दछ्४ ६७४६७६ ६७७६७5८




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