जहांगीर नामा | Jahangir Nama

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Jahangir Nama by मुंशी देवीप्रसाद - Munshi Deviprasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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॥ण्यो॥ जहांगोर बादशाइके तखूत पर बेठनेसे पद्चिलिका हाल जबकि वच्च शादइजादा सलोंम, सुल्तान सलोम भर बादशाह सलोम ककइषलाता था । जह्ांगोर बादशाह १७ रवीउलगभव्वल सन ८.०७ छिजरी वुधवार (आखिन बढ़ी ५ संवत्‌ ९६२६) को सोकरोसे शेख सलो म चिश्तोके घर पेदा झा था। उसका नाम इसी प्रसंगसे शाह सलोम ,रखा गया था । अकबर वादशाद्ने आगरेसें यह सज़लससमाचार सुनकर बहुतसा धन लुटाया और जितने कैदी किले और शद्रमें थे उन सबको छोड दिया । फिर सोकरोमें शहर बसाकर फतइपुर नाम “रखा और उसे राजधानी बनाकर आप भी वहां रइने लगा । जब शाह्त सलौमकौ उमर ४ वर्ष < सच्ौनेकी इई. तो बादशाइ ने २४ रब, सन ८.८३ (अगहन बढ़ी ११ संवत १६३०) को उसे पढने बिठाया । उसका अतालोक पहले कुतुबमोइस्पदखां अंगा आर फिर सिरजाखां:खासखानां रहा । सन «८५ में वादशाइने उमको ९० हजारो, ९१० इजार सवार का सनसब-दिया जिससे बडा उस वक्त कोई पद. नहीं,था । जब उसकी उमर १४ वर्षकों हुई तो < «३ (१६४२) में पच्षिला. व्याद राजा झगवन्तदासकी बेटीसे टूसरा; सन्‌, «४.४ (संवत १९६४३) में उटयसिंझको लड़कौसे, तौसरा जेनखां कोकेके चचा खा जाइसनकौ वेटोसे और चीधा केशव मारूको लडकौसे हुआा। , पह्लों वेगससे पह्िले सुलतान निसार बेगस और फिर २४ असरदाद- सन ८९५ (स्ावण सुदो ९३ संवत्‌- १६४४) को सुलतान खुसरो पदा मा । न ः तौसरो -बेगससे -१४-आबान सन ८४७ (कार्तिक सुद़ी ४ संवब् १६४६) को सुलतान परवेज-जनसा। , ._ व:




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