भागवत चर्चा - चौथा भाग | Bhagwat Charcha (vol. - Iv)

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |

एक विचार :

एक विचार :

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar

Add Infomation AboutHanuman Prasad Poddar

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
१६ , खँंत-महिमा प्रसिद्धि पाये हुए अनेकों पुरुष वस्तुत; संत होते भी नहीं | उनका केबल संतका ऊपरी बानामात्र होता है | मन असंत तथा विषयी ही होता है। ऐसे छोगोंसे संसारकी बहुत बुराई होती है | ये धर्म- संचालनके कार्यमें अयोग्य होते हुए भी जब उसमें अनधिकार अवेश कर बैठते हैं, तब अपने हृदयके विकारों और व्याधियोंको ही जगतमें फैलते हैं, और अपने सम्पर्वामें आनेवाले नर-नारियोंके जीवनोंको पापमय, फछत: दुःख और अशान्तिपूर्ण बनानेमें सहायक होते हैं | सब्चे संत अधिकांश अग्रकटठ ही रहते हैं, उनकी कोई ख्याति था प्रसिद्धि नहीं होती | ऐसे सच्चे संतोंको पाने और उन्हें पहचाननेके लिये संत-साधनाका आश्रय करना परम आवश्यक है । संतोचित साधनोंका--उपर्युक्त गीतोक्त चाढीस साधनोंका अभ्यास करनेसे---ज्यों-ज्यों हमारे अंदर उन गुणोंका विकास होगा, त्यों-ही- त्यों हम संत और संतकृपाके अधिकारी होंगे | कठिनता तो यह है कि हम संतोंके चमत्कारोंकों ही पूजते हैं, उनकी साधनाको नहीं--- जिसके बिना हम यथार्थ छामसे वश्चित ही रह जाते हैं । संतमावकी ग्राप्तिके साधन भगवान्‌ या भगवानके ग्रेमकी ग्राप्ति ही महुष्यजीवनका उद्देश्य है और जो इस उद्देश्यमें सफछ हो चुके हैं, वे ही संत हैं | अतएव इस संतभावकी प्रा्तिमें ही, मलुध्य-जन्मकी सार्थकता है | इसकी प्राप्िकि अनेकों उपाय शात्लों और संतोंने बतलाये हैं, परंतु इनमें प्रधान दो ही हैं ।---१-भगवानूकी नित्य असीम कपाका आश्रय और २-ढक्ष्यआएिके लिये दृढ़ निश्चर और अठछ विज्ञासके साथ किया जानेवाल्ा पुरुषार्थ !




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now