सूर्यपुराण | Surya Purana

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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निवेदन ते भारावध के पौराणिक साहित्य की शद्धुला बहुत लम्बी है। मठा- हू पुराणों के पश्वात्‌ अठारह उमबुराण और अठारह वधुयुराणों की नामावली भी युनने में भाती हैं ॥ यद्यवि यहू साहित्य व्यवस्वित नहीं है, गौर बाजार में जमीन पर पुस्तक फंलाऊर देचने वालों के यहाँ पुराणों के वाम पर दो दो, चार-चार शने वी ऐसी छोटी पुस्तकें भी बिकती दिलाई पड़ती है, जिनयी विनती कभी प्रामाणिक अयवा पठतीय पुस्तकों मे नी को जा सती । ऐसी दुरानों पर हमती “सूर्य पुराण” भौर “गणेश पुराण आदि पुस्तक देसी हैं जिनकी पृष्ठ सस्या धालीस पचास से अधिऊनहीं होती । पर वास्तविक बात ऐसी नही है ॥ उप पुराणों में भी “देवी भागयत” जोर हरिवश्य पुराण” जेंत्ते प्रसव पाये जावे हैं जो शितने हो महापुराणी से बडे और विपय वियेघत की हृध्टिसे उत्तम हैं । यह मूर्य-पयुराण” भी बापी बडा है, और विषय वी व्रमवद्धता तथा भाषा की एक रूपता के यारण जितनी ही प्ौराणित् रखनाओ दी अपेक्षा उच्च श्रेणी पा माना जा पता है । सिद्धाल वी हृश्टि प्त यह चूर्णतया घैव है और इसमें हर जग धिरडझो पी महानता का ही पचन डिया गया है । दइसझे अनुमार शिव हो परद्रद्म हैं और पार्यवी उतरी इारित ) पढ़े दोनों विएेश य्राथाण्ड की मृच्टि स्थिति और प्रनय बरते हैं । इनके अतिरिया प्रद्मा, विष्णु, इस्द्र आदि देवगण भो हैं, पर ये राय इन्हीं बे बनाये भर इनरी नदरित में द्वी “सम बरने बाते हैं। अन्य देवता, जो झ४र्ग में निद्ास करते हैं ये तो सरेय दर आधित रहे हैं, दुरार्मा दायडा से धपनों रपा मी द्रा्षगा दिया बरठे हैं॥ विष्णु देश साझा या पश्त पा रर दाए्यों मे गणम करते है, उनाा नाश का ते हैं, पर उनरो यू शिव शिरणों द्वारा हो धर्गीत है । 'ऐुं पुराण में कहा पद्ा है हि डिप्यु भावान ने गदय नाम द्वारा शिक्ररी वी हदृति जी दर उडडी पूशा करते हुए छ॒द एद्र बसस दम पह गया तो बी




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