संस्कृत शास्त्रों का इतिहास | Sanskrit Shastron Ka Itihas

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Sanskrit Shastron Ka Itihas by आचार्य बलदेव उपाध्याय - Aacharya Baldeva Upadhyay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १४ बू ९) सनक ( १० ) स्फोटायन ३९८, इन्द्र ३९८, काशकतुस्त ४००, पौष्कर-सादि ०१, सागुरि ४०२, साध्यन्दिति ४०, वैपाघ्पय ४०३, ',पाणिनि तथा दूर्वाचाये ऋ०्३-४०८, पारिमायिक सज्ञा तथा पूर्दार्य इ०८ ४११, पूर्वावाधे-कत पारि० भाषिक संज्ञाएं ४११-४२३ 'दट्ितीयखण्ड--उत्क पंकाल रद पाणिनि ४र४, पाणिनि का देशकाल ४६, ग्रय ४२०, अष्टाध्यायी का विपयन क्रम ४२९, पाणिनि मौर संस्कृत भाषा ४३४, पाणिनिकालीन लोकभाषा ४३६०१३९; पाणिमि-उपज्ञात सज्ायें इ३९-४४३, दाज्ञायग व्याडि ४४३-४४७, कास्यायन '४४3, चाविक का लक्षण ४5, कांत्यायत को भाषा ४५२, कास्यायन को देश कांच ५ । पतंजलि ४५६, देशकाल ४५६, पतंजलि की सवाद शैली ४५९, पतंजलि का जीवन चित ४६२, कायायन तया पतजलि ४३३, ययोत्तर मुनीना प्रामाण्यम्‌ ४६६1 सूतीया खण्ड-व्यास्पा युग '४६९-४९९ मतूं हरि ४७१, वाकपपदीय ४७३, भतृहरि का देश ४७४, भू हरि का काल ४७3, कारिकाओ की संख्या ४७९, टीका सम्पत्ति ८१, द्वितीय खण्ड की टीका दू४परे, प्रथम काण्ड ( ब्रह्म कांग्ड ) अनरे, द्विवीय काण्ड ( व क्य काण्ड ) हँ5 3, तृतीय काण्ड ( पद काण्ड ) ४८७, कैयट ४८८, अध्टाध्यायी की वृत्तियाँ ४६०३ माग वृत्ति ४९०, माग दुत्ति का वैशिष्टय ४९४, भाषावृत्ति ४९५, दुर्घेट वृत्ति ४६६ काशिका की व्याव्याएँ ४९७, न्याप्त ४९७, पंदमजरी ४९८ । चतुर्थ खण्ड--प्रक्रिया युग ००-४१ प्रक्रिया कोमुदी के प्रणेता ५०१, प्रक्रिया कौमुदी का रचना काच ५०२, प्रक्रिया कौमुदी ५०३, प्रक्तिया कौमुदी का वैशिष्टय ५०६, शेपकृष्ण तथा. भट्टोजिरीशिंत का वश वृक्ष भ०९॥ मद्टोजि दौक्षित ५०९, ग्रन्य ५११५ सिद्धान्त कोमुरी ५१३, व्यारपाकार पड, सट्टोजि दीक्षित का परिवार ५१४, कोण्डमट्ट ५१७, ग्रत्य ५२०, भदुटोजि- दीक्षित के शिष्य श२१, वरदराज ५२५, नारायण भट्ट ५२६, प्रक्रिया सईस्व २७, विशिष्टता ५२८, व्याकरण के 'वियय में शारायण मटुट का मठ श३०, नागेश भट्ट १३५, ग्रेव ३३२, वैशिष्ट्य भ ३, सागेश को गुर शिष्य परम्परा अडे६, नागेस के अतन्तर ५३७, पाणिनोय व्याकरण को विकाम दिशा ३९ । पंचम खण्ड -पाणिनीय तन्व के खिल म्रन्य इधर ७व




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