प्रेमचंद और उनका साहित्य | Premchand Aur Unka Sahitya

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Premchand Aur Unka Sahitya by मन्मनाथ गुप्त - Manmnath Gupt

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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है जे जाता है, हमको अपने चारों तरफ बुराई ही बुराई नज़र थाने लगती है । यथार्थवाद के गुणावगुण “इसमें संदेह नहीं कि समाज की कुप्रथा की आर उसका ध्यान दिलाने के लिए यथाथवाद अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि इसके घिना बहुत संभव है, हम उस चुराई को दिखाने में अ्रत्युक्ति से काम लें और चित्र की उससे कहीं काला दिखायें जितना चह्द वास्तव में है। लेकिन जब वह दुवेलताओं का चित्रण करने में शिछ्ता की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है, तो आपत्ति- जनक हो जाता है। फिर मानवच-स्वभाव की एक चिशेषता यह भी है कि बहू जिस छल और चुद्रता छौर कपट से घिरा हुआ है; उसीकी पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकती | वह थोड़ी देर के ५िए ऐसे संसार में पहुंच जाना चा४ता है; जहाँ उसके चित्त को ऐसे कुत्सित भावों से नजात मिले-चहू भूल जाय कि में चिताओं के चंघन में पड़ा हुआ हूँ ; जहाँ उसे सज्जन, . सद्ददय, उदार प्राणियों के दर्शन हां; जहाँ छल और कपट, विरोध ओर वेमनस्य का ऐसा प्राधान्य न हो । उसके दिल सें रुपाल होता है कि जब हमें किस्से-कद्दानियों में भो उन्दीं लोगों से सावक्ना है जिनके साथ आठों पहर व्यवहार करना पड़ता है, तो फिर ऐसी पुस्तक पढ़ें ही क्यों ? आदर्शवाद की विशेषत्ता “्रेघेरी गर्म कोठरी में काम करते-करते जब हम थक जाते हैं तो इच्छा दोदी है कि किसी बाग में निकलकर सिमंल स्वच्छ चायु का शानंद उठायें ।--इसी कसी को श्राद्शवाद पूरा करता है। चह हमें ऐसे चरित्रों से परिचित कराता है, जिनके हृदय




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