प्रेमचंद और उनका साहित्य | Prem Chand Or Unka Sahitya

Prem Chand Or Unka Sahitya by मन्मथनाथ गुप्त - Manmathnath Gupta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ११) जाता है, हमको अपने चारों तरफ बुराई ही बुराई नज़र आने लगती है । यथाथवाद के गुगावगुण “इसमें संदेह नहीं कि समाज की कुप्रथा की ओर उसका ध्यान दिलाने के लिए यथार्थवाद अत्यन्त उपयुक्त हैं, क्‍योंकि इसके विना बहुत संभव दै, हम उस बुराई को दिखाने में अत्युक्ति से काम लें और चित्र को उससे कहीं काला दिखाये जितना वह वास्तव में हे । लेकिन जब वह दुर्बलताओं का चित्रण करने में शिष्टता की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है, तो आपत्ति- जनक हो जाता है। फिर मानव स्वभाव की एक विशेषता यह भी है कि वह जिस छल ओर कुद्रता और कपट से घिरा हुआ हे, उसी की पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकती | वह थोड़ी देर के लिए ऐसे संसार में पहुँच जाना चाहता है, जहाँ उसके चित्त को ऐसे कुत्सित भावों से नजात मिले--वह्‌ भूल जाय कि में चिंताओं के बंधन में पड़ा हुआ हूँ; जहाँ उसे सज्जन, सहृदय, उदार प्राणियों के दरशन हों; जीं छल ओर कपट, विरोध श्रौर वैमनस्य का ऐसा प्राधान्य न हो। उसके दिल में ख्याल होता है कि जब हमें किस्से-कहानियों में भी उन्हीं लोगों से सावका हे जिनके साथ आटो पहर व्यवहार करना पड़ता है, तो फिर ऐसी पुस्तक पढ़े' ही क्‍यों ? ( ज आदशंबाद की विशेषता “अंधेरी गर्म कोठरी में काम करते-करते जब हम थक जाते हैं तो इच्छा होती है कि किसी बाग में निकलकर निर्मल स्वच्छ वायु का आनंद उठाये |--इसी कमी को आदशेबाद पूरा करता है। बह हमें ऐसे चरित्रों से परिचित कराता है, जिनके हृदय




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