गोरक्षा प्रकाश भाग - १ | Goraksha Prakash Bhag-i

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Goraksha Prakash Bhag-i by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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९६ शीरशाप्रकाश 1 कपूलीए में साल्लकों गुण पाये लाते इं! सी) ली इ1 न बताइये (गो) देखो बेद्यकवाले लिखसे का “हे चीरिका'टुर्गरावल्याधातुपुष्टप्रदा गुम विप्मिनी हर्पिततिरप्तापि्तार्निमाझतान्‌ ॥ #ी का पर अर्थ -'सीर न हँ सो गुय, हैं चोर घात पटकारफ्‌ है और आभारी है ( स) को जी चीर के बिना भीर कुछ न खाय,? ( गो ) अस्त को कछोडूकर आर फ्या प्र खायमा (स)श्या घीर का भीजन अख्त है १ (गो) जी छा (स?. ऐसा कद लिखा दे ( गो ) देखो-- दर ष्म्टतं शिणिंग वन्हिरग्टतसं वालभापणम्‌ । अस्त राज्यसन्सानस्टतं 'लौरमोजनं ॥ परत ही हु + 1 वर्थ-ज्ञाढ के समय में अग्नि अस्त े भ्रीर बा. णियों से वानिक की वाणी अस्त ई और संबरानो में राज्ञा सेमी श्रसत है और भोजनों में छीर का भोजन अ झुसे है, अंसतिद्ी होने के कारण ब्राध्म सो को चौर प्रिय छे यश + () ऐसी कीड़ा लिखा है कि ब्राह्मणों को चीर प्रिय कै? (कि दर्या- अल कक के न््ध् डे. १६ पहल गा पर जपकारप्रियो , विदुजलधाराप्रिय: शिव: -। (वुमस्कारप्रियो मानुनच्यियों मघुरप्रिय: ॥; «




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