रूस में छियालीस दिन | Roos Me Chhiyalis Din

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Roos Me Chhiyalis Din by यशपाल जैन - Yashpal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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2 2४ काबुल में कमरे में सामान रखकर नीचे भोजन करने गये तो एक मजेदार घटना हो गई । भोजनालय मे मेज पर बैठकर मेने बैरे को भ्रपने लिए निरामिष श्रौर बगालीभाई के लिए सामिष खाना लाने को कहा । थोडी देर मे खाना श्राया तो दोनो के लिए शाकाहारी । देखते ही बगाली-भाई ने त्यौरी चढाकर कहा मुभके तो मीट (मास) चाहिए । तुमने किस तरह श्रार्डर दिया ? (वैरे से ) देखो हमारे लिए मीट लायगा मीट | समभक्ता (फिर मुक्ते सवोघन करके ) श्रागे से तुम श्रपने लिए खाना मगायगा हम श्रपने लिए मगायगा। मैने मजाक मे कहा भाईमेरे मुह क्यो चढाते हो तुम्हे तो दोहरा फायदा हो गया । शाकाहारी खाने का भी श्रानद लोगे। मास तो उडाओगे ही । असल मे यह मुसीवत इसलिए हुई कि होटल के बैरे या तो पदतो जानते थे या फारसी । दो-एक को टूटी-फूटी श्रग्नेजी श्राती थी । इसीसे उन्हे वात समकाने श्र उनकी वात समभने मे दिवकत होती थी । खा-पीकर हम लोगो ने थोडी देर विश्राम किया । फिर घूमने निकले । सौसम अच्छा था । छ हजार फुट की ऊचाई पर बसे होने पर भी नगर मे सर्दी अधिक न थी वल्कि दिन मे तो कुछ गर्मी ही मालूम हुई । लोगो ने बताया कि श्रसली मजा तो यहा लाड़ो मे आ्राता है । कडाके की ठड पड़ती है । चारो श्रोर वफ॑ जम जाती है। श्रफगानिस्तान मे एक कहावत है कि वहा के निवासी सोने के बिना रह सकते हे बर्फ के बिना नहीं । इसका मतलब यह है कि उन्हें वहुत-सा पानी वर्फ के पिघलने से प्राप्त होता हैं। इसलिए कुछ महीनों में अच्छी फसल के लिए उन्हे वर्फ पर निर्भर करना पडता है । काबुल श्रफगानिस्तान की राजधानी है । बड़ा नगर है वस्ती दूर-दूर तक फैली है लेकिन देखने मे वह एक देहाती कस्वे जैसा लगता है । सूखे पहाडो पर से




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