हमारा स्वाधीनता संग्राम | Hamaaraa Svaadhiinataa Sngram

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सिंद।वलोकन ७ जगा दे भारत को करतार । घनी जगें श्रमजीवी जागें जगे कृपक-परिवार । ऐसा जगे खोजता निज बल मान-वुद्धि अधिकार ॥। अआज यह प्राथना पूरी हो चुकी है । आज भारत घनी क्रपक श्रमजीवी-भारत समस्त भारत जगा हुआ है। वह उद्बुद्ध है ओर अपना बल तथा अपना सान प्राप्त करके वह साम्राज्य- वाद की समस्त शक्तियों को ललकार कर यह कह रहा है किः-- दीन हैं हम किन्तु रखते मान हैं । भव्य भारतवप की सन्तान हैं ॥। न्याय से श्धिकार अपने चाहते । कब किसी से माँगते हम दान हैं ॥। राजनेतिक क्षेत्र में हम मोरचे पर मोरचा फतह करते हुए आगे बढ़े हैं और १४४९ के स्वाधीनता संग्राम के बाद अपनी सामथ्य तथा जनता की असीम शक्ति का ज्ञान प्राप्त करके इस दुदमनीय विश्वास के साथ अन्तिम मोरचे पर खड़े हैं कि हमारी विजय निशिचत है। सब से अन्तिम परन्तु सब से अधिक महत्वपूर्ण लाभ हमें यह हुआ कि १६४२ के तूफान से हमें अपनी कांग्रेस-जनों की कमियाँ तथा कांग्रेस-संगठन की कमजोरियाँ मालूम हो गईं। अपनी स्वाघीनता के अन्तिम संग्राम में कूदने से पहले हम इन्हें दूर कर दगे। फलस्वरूप हमारी इस स्वाधीनता-संप्राम की योजना मानव-शक्ति सम्भव निर्दोष योजना होगी और इश्वर ने चाहा तो श्रपनी सत्य और अहिंसा की शक्ति-प्रदशन से ही या




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