वैदिक व्याकरण [भाग-1] | Vaidik Vyakaran [Bhag-1]

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Book Image : वैदिक व्याकरण [भाग-1]  - Vaidik Vyakaran [Bhag-1]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिकों दिटने ने अपने सैस्कृत-व्याकरण की भूमिका में लिखा है कि प्रत्येक व्याकरण अवश्य दी अधिकाश में पू्ववर्ती व्याकरणों पर आधारित दोता दे । प्रस्तुत वैदिक व्याकरण को इस साधारण नियम का अपवाद तो नहीं माना जा सकता, परन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस व्याकरण की रचना में पु्ेचर्ती व्याकरणों से पूर्ण सहायता लेने के साथ-साथ वैदिक कोषों, अनुसन्धानात्मक लेखों, प्रातिशाख्यों, वैदिकभाष्यों तथा मूल वैदिक प्रन्थों का पूर्ण उपयोग किया गया हैं । इस व्याकरण में सभी उदाहरणों को मूल वैदिक भ्रन्थों से मिलाकर उद्धृत किया गया है और जहां कहीं पवेवर्ती व्याकरणों के उदाहरणों या नियमों से मेरा मत-भद है, वहां पर इस यात की ओर संकेत किया गया है, यथा--पू० ४८, ४९, ७६, १४६, १५९, १६७, १६६, १६८, १६९, २७६, ३८२ इत्यादि पर सैक्डानल के वैदिक व्याकरण के कतिपय ऐसे स्थलों की ओर संकेत किया गया हे, जिन में मेरे मतानुसार संशोधन की आवश्यकता है । वैदिक व्याकरण सें वैदिक: पदों के अनेक ऐसे उदाहरण दिये गये हैं जो पूर्ववर्ती वैदिक व्याकरणों मैं नहीं दिये गये थे; यथा-- एुसदू , एन, अन्य, इसर तथा सर्वे इस्यादि सवनामों के रूपों की तुलना कीजिए । परन्तु पूर्ववर्ती व्याकरणों में उद्धृत जिन वैदिक उदाहरणों का सूल स्रोत मुझे नहीं मिला है उन के सम्बन्ध में मैंने अपनी असमर्थता प्रकट की है; यथा दे०-- ष्व० ३७२ टिल्‍ ९०, प्ृ० ३९५ दिन २६४, पृ० ३८९ टि० २३८, पृ डे दि० १०२, छू० ३६६ टिन रेण-३६, प्ृ० १६३ टिन ६७ ग, एन दे६७ टिन् नल जो वैदिक रुप बहुत से प्रन्थों में मिलते हैं उन के सामने ग्रन्थ-नाम का निर्देश नहीं किया गया है । परन्तु जो रूप वेदिकभाषा में विरल हैं या किसी पक ही प्रन्थ में मिलते हैं उनके सामने कोछक में प्रन्थ-नाम का निर्देश किया गया है; यथा-- पु ३४० युवो: (ऋण), धुन २४१ थुवे (अ० ७,१०९,५ ), प्र० ३३५ युप्साः (वा सं० १.१३; ११, ४७), प्ृ० २५४ दोप्णः ( शत ज्रा० हे, ८, दे, १७) । जिस किसी वैदिक उदाहरण के व्याकरण-सम्बन्धी व्याख्यान के विषय में मतंभेद है, उस का सेक्लिप्त परिचय टिप्पणियों में निष्पक्ष रुप से दिया गया है और आवदयकतानुसार लेखक ने अपना मत भी व्यक्त किया है । पाठकों की सुदिधा के लिये लैग्रेजी, जमन तथा फ्रेध भाषा में लिखित ग्रन्थों का स्थल-निंदेश पाइचात्य-पद्धति के अनुसार रोमन-लिपि में किया गया है 15 )




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