भारतेन्दु ग्रन्थावली खंड 2 | Bhartendu Granthavali Khand-2
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
22.54 MB
कुल पष्ठ :
952
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)भक्त स्वस्थ
भा
. त्रिकोण के चिन्ह को भाव चर्णनस्वीया परकीया चहरि गनिका तीनहू नारि |सबके पति अ्रगटित करत मनसथ-सथन सुरारि ॥ १ ॥तीनहु शुन के भक्त को यह उद्धरण समर्थ ।सस त्रिकोन को चिन्ह पद धारत याके अर्थ ॥ २॥घ्रह्मा-दरि-्दर तीनि सुर याही ते. प्रगटंत।या दित चिन्दद त्रिकोन को धारत राधाकंत ॥ ३ ॥श्री-भू-ठीछा . तीनहू दासी याकी. जान ।यातें चिन्ह तप्रिकोन को पद धघारत भगवान ॥ ४ ॥स्वर्ग-भूमि-पाताढ में विक्रम हें गए धाइ।याहि जनावन देत न्रय कोन चिन्ह दरसाइ ॥ ५॥।जो. थाके शरनहिं गए सिटे तीनहूँ ताप ।या हित चिन्ह प्रिकोन को धरत हरत जो पाप ॥ ६ ॥भक्ति-ज्ञान-वैराग. हैं. याके साधन तीन ।यातें चिन्ह चरिकोन को छृप्ण-चरत छखि छीन || ७॥!त्रयी सांख्य आराधि के पावत जोगी जौन ।सो पद है येहि देत यह चिन्ह न्रिश्नुति को मौन ॥ ८ ॥दुन्दावन छ्वारावती मधघुपुर तजि नहिं. जाहिं ।यातें चिन्ह ब्रिकोन है कृप्ण-चरन के. माहिं || ९ ॥|का सुर का नर असुर का सब पें ष्टि समान ।एक भक्ति तें होत चस या दित रेखा जान ॥१०॥सित शिव जू वंदन करत तिन नैननि की रेख ।या हित चिन्ह त्रिकोन कों कृप्ण-वरन में देख ॥१९॥|घृक्ष के चिन्ह को भाव वर्णन
वृक्ष-रूप सब जग उअहै वीज-रूप दरि आप |
थातें तर को चिन्ह पग प्रगटत परम प्रताप ॥ १ !।पुग्क
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