जातक तृतीय खण्ड | Jaatak Vol.-3

Jaatak  Vol.-3 by भदन्त आनन्द कौसल्यायन - Bhadant Anand Kausalyayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ १९ | १, कणबेर जातक २२६ [ब्यामा ने नगर-कोतवाल को हजार दे डाकू की जान बचाई और उस पर आसक्त होने के कारण उसे अपना स्वामी बनाया । डाकू उसके गहने-कपड़े ले चलता बना 1) ३१९. तिलिर जातक २३१ [चिड़िमार फॉसाऊ-तीतर की मदद से तीतरों को फैंसाता था। तीतर को सन्देह हुआ कि बहू पाप का मागी है वा नहीं ? ] ३२०८ सुच्चज जातक २३३ [रानी ने राजा से प्रछा--यदि वह पर्वत सोने का हो जाय, तो मुझे कया मिलेगा? राजा ने उत्तर दिया--तू कौन है, कुछ नहीं दूँगा । | ३० कुटिदूसक वग २३८ ३२१. कुटिवूसक जातक २३८ [बन्दर ने बये के सदुपदेश से चिढ़कर उसका घोंसला नोच डाला |] ३२९. दहभ जशातक २४९ [खरगोश को सन्देह हो गया कि पृथ्वी उलट रही है। सभी अन्थ-विदवासियों' ने उसके. अनुकरण में मागना. आरम्म किया । ) ३२३८ ब्रह्मदत्त जातक २४५ [ब्राह्मण ने बारह वर्ष के संकोच के बाद राजा से एक छाता और एक जोड़ा जूता भर माँगा। | ३२४, अम्मसाटक जातक २४९ [मेढा ब्राह्मण पर चोट करने के लिए पीछे की ओर हटा । ब्राह्मण ने समझा मेरे प्रति गौरव प्रदर्शित कर रहा है। |




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