विजय यात्रा | Vijay Yatra

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Vijay Yatra  by जय चन्दलाल - Jai Chandlal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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यात्रा 3 के ् 2 थे श् आलोक भगवान्‌ ने कद्दा--गोतम । जीव अ्रिकालवर्ती दै- शाश्वत है । इन्द्रिया उसे नद्दीं जान सकतीं । वह अरूप है इत्द्रिया सर्प को ही जान सकती है । मानसिक चथ्वढता रहते हुए आत्मा या स्व की अनुभूति नह्दीं होती। वह अनन्त ज्योतिमंय जीव शरीर इत्द्रियि और सन से परे है।




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