विजय यात्रा | Vijay Yatra
श्रेणी : जैन धर्म / Jain Dharm

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
198
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)तीन
१ ट् के
थि रे
आलोक
भगवान ने कहा-गोतम ! जीव त्रिकाछवर्ती है- शाश्वत है ।
इस््रिया दप्ते नहीं जान सकतीं। वह अरूप है; इत्द्रिया सरूप को
ही जान सकती है।
मानसिक च्वढता रहते हुए आत्मा या सत्र की अनुभूति नहीं
होती। वह अनन्त ज्योतिर्मय जीव, शरीर, इन्द्रियि और मन
से परे है।
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