दर्पण का व्यक्ति | darpan ka vykati

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Darpan Ka vykti by विष्णु प्रभाकर - Vishnu Prabhakar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दर्द को न पहचानेगी तो कौन पहचानेगा ? पार्वती ने वेटी को देखा तो सब कुछ समझ गई और भोले वावा से बोलीं, “कितनी दुखी है यह बच्ची ! इसका सुहाग लौटा दो । भोले वावा हंस पड़े । बोले, “पार्वती, तुम नारियों का दिल वड़ा कोमल होता है। लेकिन तुम नहीं जानतीं कि इस लड़की ने कितना वड़ा अपराध किया है।”' पार्वती ने उत्तर दिया, “जानती क्यों नहीं महाराज ! लेकिन साथ ही यह भी जानती हूं कि वह अपराध अनजाने में हुआ है और फिर उसकी कितनी सजा भुगत चुकी है वेचारी । हर वात का अन्त होता है । कया इसकी पीड़ा का अन्त नहीं होगा ? नहीं, आपको मेरी वात माननी ही होगी । इसके पति को जीवित कर दीजिए ।”' शंकर ने उसी क्षण अपनी अंगुली काट डाली । उसमें से चूकर अमृत की कुछ वूंदें वेटी के पति के शव पर पड़ीं । वह ऐसे उठ बैठा जैसे हम सवेरे सोकर उठते हैं । काश 1! आजकल भी शिव-पावती इस दुनिया में आते होते तो देख पाते कि उस बेटी जैसी एक और नारी मृत पति को लेकर नहीं, वत्कि एक जीवित पति को लेकर रो रही है । मांग में सिन्टूर भरकर भी वह सुद्दाग से वंचित है । *** लेकिन वीसवीं सदी में शंकर-पार्वती इस प्रकार नहीं घूमते । इसी लिए ये लम्वे तीस वर्ष उनकी प्रतीक्षा करते-करते वीत गए हैं । मेरा सुहाग मेरे सामने रहकर भी मेरा न हुआ । होता भी कैसे ! कहानी की उस वेटी की तरह तो मेरी कहानी नहीं है । इसीलिए नियति ने मेरे जीवन के चारों ओर जो ताना-वाना बुना है, वह विल्कुल ही अलग है। मेरा जीवन व्यर्थ है। लेकिन क्यों ? क्यों उस सर्वेशक्तिमान्‌ प्रभु ने एक॒मिरपराधघ के जीवन को निरर्थक बनाया है? क्‍यों उसे दुहरी-तिहरी पीड़ा शुगतने पर विवश किया है? मैं फिर वहक गई । तुमने मुझे सामीप्य का सुख नहीं दिया, पर दर्पण का व्यक्ति ११ नह




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