अभिधर्मकोश भाग 2 | Abhidharma Kosh Vol.-2

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Abhidharma Kosh  Vol.-2 by नरेन्द्रदेव - Narendra Deva

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथम कोशस्थान धातुनिदेश १५ चंक्षुरिन्द्रिय श्रोत्र घ्राण जिह्ना काय । [१५] पांच अथे जो ५ इन्द्रियों के विषय हूँ--रूप शब्द गन्ध रस स्प्रष्टव्य । इनमें अविज्ञप्ति (१.११) को शामिल कर रूपस्कन्ध होता है । हमने रूपदाब्दादि पांच अर्थ गिनाए हैं । ९ सी-डी . इन अर्थों के विज्ञान के आश्रय रूप-प्रसाद चक्षुरादि पंचेन्द्रिय हैं। (इन्द्रिय भूत- विकारविशेष हैं) चक्षुविज्ञान श्रोत्र घ्राण जिद्धा और कायविज्ञान के जो पांच आश्रय हैं और जो रूपप्रसाद और अतीस्द्रिय हैं वह यथाक्रम चक्षुरिन्द्रिय श्रोत्र घ्राण जिह्ना कायेन्द्रिय हैं। यथा भगवत्‌ ने कहा है हे भिक्षुओ चक्षु आध्यात्मिक आयतन भौतिक प्रसाद रूप.. । अथवा इसका अ्थे इस प्रकार हो सकता है ९ सी-डी. इन इन्द्रियों के विज्ञानों के आश्रय अर्थात्‌ .....चर्क्षुविज्ञान आदि के आश्रय--यह अर्थ प्रकरण ग्रन्थ (१३ ए १०) का अनुवर्तन करता है। प्रकरण में है -- चक्षुविज्ञान कया है ? यह प्रसादरूप है जो चक्षु के विज्ञान का आश्रय है। रुप॑ द्विधा विंगतिधा दाब्दस्त्वष्टविधो रसः । घोढ़ा चतुर्विधो गन्थ स्पूदयमकादशात्सकस्‌ 1१ ०॥। हम रूपायतन से आरम्भ कर ५ अर्थों का अब विचार करते हैं। [१६] १०ए रूप द्विविध है रूप २० प्रकार का है। १. रूप वर्ण और संस्थान है। वर्ण चतुरविध है - नील लोहित पीत अवदात । अन्य वर्ण वर्ण-चतुष्टय के भेद हैं। संस्थान (४.३ सी) अष्टविध है - दी छ्लस्व वृत्त परि- मंडल उन्नत अवनत शात विद्यात । २. रूप के २० प्रकार हैं - ४ मूल जाति के वर्ण ८ संस्थान ८ वर्ण--अभ्थ धूम रज महिका छाया आतप आलोक अन्धकार । कोई नभस्‌ को भी जो वैड्य-भित्ति के आकार तद्ठिज्ञावाश्रया रूपप्रसादइचक्षुरादयः ॥ [व्याख्या २३ . ३२] पांच इच्द्रियां अतीन्द्रिय अच्छ इच्द्रियग्राह्म-वस्तु-व्यतिरिकत रूप-स्प्रष्टव्यादि-व्यतिरिक्त हैं। इनके अस्तित्व का ज्ञान अनुसान से होता है। जिन्हें लोकभाषा में चक्ुरादि कहते हैं बह इनके अधिष्ठान हैं [व्याख्या २४ . १३] (१.४४ ए-बी ) । पसादचक्खु चक्खुपसाद पर धम्मसंगणि ६१६ ६२८ देखिए । २ ३.३५ सें उद्धृत सूत्र देखिए--विभंग १९२ साइकालोनी १७३ से तुलना कीजिए । ९ पहला अर्थ विभाषा ७१ १२ के अनुसार हे। १ रूप द्विघा बिदतिधा [२५.६ २५ १३--व्यार्या में द्विधा के स्थान स हिबिधा पाठ प्रामादिक हे ।] विभाषा १३ . ९ महाव्युत्पत्ति १०१ धम्मसंगणि ६१७ से तुलना कीजिए । ९ सौच्ान्तिक यह नहीं सानते कि संस्थान वर्ण से द्रब्यान्तर हे ।




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