उपदेश - रत्न कोष | Upadesh Ratn Kosh

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
1.28 MB
कुल पष्ठ :
53
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)उप केश-रत्स-कतेब |. ७मिल सकेगा, झर अुगलोी लाने, वाले, तथा बिन्दा करने
वाला को, ऊपर कहे दुप: सद्धुष्य की लिन्दा करने का बदहासा
भी न मिल सकेगा ।कलिकाल का सी कुछ नहीं चल सकता ॥!नियमिज्जइ नियजीहा अधि आरिअिं नेव किज्जएकज्ज
नकुलकम्मा अ लुप्पड़े कुविसो कि कुणइ कलिकालो ५४नियमनीया निनजीड़ा अधिचारितं 'नेव करणीयकृत्यं |
न कुल क्रमश्च लापनोीय: कुपितः कि करोति कलि कालः ॥भअथ--झपनी जीम को कश में रखिये. कभी भी. बिना
स्गोचे समभे काम न करिये, झौर कल्ाचार को न लोपिये तो
सालात्ू कोपायमान कत्ति भी कया ऋर खसक्ता है? कुछ नहीं |वित्रेचन--जो असत्य निन्दारूप,क्श वद्ध के. तथा निर-
थक्क, चचन न बोलते, सितभाषी होने की हादिक इच्छा
जगें, द्रव्य, च्तेत्र. काल, भाव, सम्बन्धी चिचार किये बिना
कोई कत्य न करने की. ध्यान में रहे, शरीर बिमा किसी यड़े
परो कार के कलाचार न लोपने की सावधानी रहे तो कितनी
भी कड़ी शत्रता वाला बरी दुप्ख न दे सके, क्योंकि जो
निश्यय श्रौर व्यवहार से पत्िन्न हैं उन पुरूषों के शत्र भी
मित्र बन ज्ञात हे ।सज्जन का राह |सम्स न उलबिज्जइ कस्स वि आल न दिज्जह कऋयावि
को वि न उकको सिज्जह सज्जण सग्गों इसो दुर्गो।।
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