अलबेरुनी का भारत | Albureni ka bharat

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Albureni ka bharat by पं संतराम जी - Pt. Santram Jee

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ११२. ) के प्रारम्भ का उल्लेख है। तीसरी जगह वह मुलतान के हिन्दुओं के एक सौद्दार का चृत्तान्त लिखता है । उसे मुलतान के स्थानीय इतिहास आर स्थल-विवरण का अच्छा ज्ञान था । यहाँ के दुलभ नामक एक विद्वान का सी चद्द उल्लेख करता है । श्रन्त में वह लिखता है कि पुरशूर (92) गामक स्थान में मैंने हिन्दुओं को शंख श्रोर ठोल वजा कर दिन का स्तरागत करते देखा । उस समय हिन्दू-विज्ञान श्र विद्याओं के वड़े वड़े विश्व-विद्यालय कश्मीर ओर काशी झ्रादि मुसलमानों के लिए दुर्गम थे । - अनुवादक रूप में अंथकार का काम, ओर भारतीय विषयों पर उसकी पुस्तकें । अनज्लुवादक रूप में अलवेरूनी का काम दुदरा था । उसने संस्कृत से झरवी में श्रोर श्ररवी से संस्कत में श्रनुवाद किये । वह मुसलमानों को भारतीय विद्याओं के अध्ययन का झ्वसर देना चाहता था, श्र साध ही श्ररवी विया का दिन्दुओं में प्रचार करने की भी उसे उत्कट अमिलापा थी । जिन पुस्तकों का उससे अरवीं में अनुवाद किया हे वे ये ईं:-- (१) कपिल का सांख्य | (२) पतब्जलि की पुस्तक | (३) पालिस (पालस्त्य) सिद्धान्त, तथा (४) त्रह्म सिद्धान्त । ये दोनों पुस्तकें न्रह्मशुप्त कृत हैं । झभी इन का श्रनुवाद समाप्त नद्दीं हुआ था कि उसने भारत पर पुस्तक लिखी । (५) बह्त्संदिता, तथा । (६) लघुजातकम्‌ । ये दोनों पुस्तकें चराहमिहिरि की बनाई हुई हें । जब वद भारत पर अपनी पुस्तक लिख रहा था उसी समय वह




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