आर्ष - ग्रन्थावलि बृहदारण्यक उपनिषद् | Aarsha - Brahdaranyak Upanishad

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Aarsha - Brahdaranyak Upanishad by पं राजाराम प्रोफ़ेसर - Pt. Rajaram Profesar
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पुस्तक का साइज़ :
9.14 MB
कुल पृष्ठ :
336
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहला अन्याय क# पढ़ा नाह्मण 1 ( अब अचवतराण का-रसूचा भाविष्क यज्ञ मे कचरा रूपा अचवन का चणन 1 आओइस्‌ । उषा वा अश्वस्य मेध्यश्य शिरः सखूय श्रन्नवातः प्राणो व्यात्तमर्थिवेंश्वानरः संवत्सर आत्मा उस्वस्य मेध्यस्य । योः एष्ठ मन्तारिक्ष सदर प्राधिवी पा- जस्यं दिशः पार्खे अंवान्तर-दिशः पशीव ऋतवों ध्ज्ा- नि मासाश्राध-मासाश्र पर्वाण्यहारात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मारसानि । ऊव्ध्य सिकताः _ सिन्धवों शदा यकृच छोमानश्व पवेतो ओषधघयश्र व- नस्पतयश्र छोमान्युय्‌ प्रवोर्षों निम्लोचझघनार्घो यदू विजूम्सते तढ़ विद्योतते यद विध्ूजुते ततत स्तनय ति यन्मेह्ाति तद्वषेतिं वागेवास्य वाकऋ ॥ १ ः उपा धृ यज्ञ के योग्य घोड़े का सिर है सय्य आँख हें वालु माण हैं बैश्वानर अध्रि खुला ( सुंद ) है और बरस यज्ञ के योग्य घोड़े का दारीर है यो पीठ है अन्तारिक्ष पेट है प्रथिवी क% यह बारप्यक्कका तीसरा अध्याय है पर उ पानिपद्का पहल। हे 1 इस्त उपानिषद् में सान प्रच्हार के सक हैं पदला अध्याय सका दूसरा न्वाइाण स्का और तीसरा स्वण्ड का । इस्स पदले घ्नाइाण का नाम सश्वघ्नाइ्यण दे ॥ लि घूंड उबास्त्वह्द समय जब माफाश में छाली पड़ती है. हु चैश्बानर अशिस्टवद् जश्ि जो इरपक पदार्थ में फैला छुआ है मथीय समाएिरूप सदि ॥




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