कहानी संग्रह भाग - २ | Kahani Sangrah Bhag - 2

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Kahani Sangrah Bhag - 2 by पंडित चंदाबाई जी - Pt. Chandabai Ji
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 6.73 MB
कुल पृष्ठ : 198
श्रेणी :
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पंडित चंदाबाई जी - Pt. Chandabai Ji

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पतिन्रना त्टत्टना । ११ आती व देय विवि वि चदवववकदलसबार ६. रचोफचिकचीरीरी लनललकि देकर मार गिराया वेश बोली देखती हूँ अब तुझे कौन रखता है। है न तेरे पास अब घन ? पिता भी तुझे नहीं रखेंगे भीख सांगना और गली गली घूमना । मनमोहन नौकरके ही वेशमें यह सब नाटक देख रहा था । इतनेमें वही ग्वालन आई और उसने पतिकी हाठत देखी । ग्वालनने बेणके वचन सुन छिए थे कि देखती हूँ तुझे कोन रखता है? उसने झटसे उत्तर दिया--इन्हें से रखंगी । इतनेमें सनमोहन अपना बेश बदठकर आया और तदयाको सचेत करता हुआ काली चरणके दुर्गणोंका ब्यान कर गया । बेदपाकों कालीचरणये छणा हुई । उसने कहा सभी चढ़े जाओ अब मुझे सोचने दो किं मुझे क्या करना चाहिए ? खालन महेंद्रको अपने नए सकानमें ले गद । और स्नानादिक करवा भोजन दे दिश्रामके छिए कहा । आनेंढके साथ नित्य क्रिपासे निवठी और स्वत सनसें छतछृत्य हो प्रसुका उपकार साना । इस समय महेंद्र गाय-मैंससे लाड़-प्यार कर रहे थे । इसी समय पीछेते आकर ग्वाठनने मरहेंद्रकी आंखें मुंद लीं। उसने पूछा--बताओ तो मैं कोन हूं? मरें्रने कहा--तू मेरे नयनोंकी ज्योति है। आंख बंद होंगे पर भी से तुझे देख सकता हूँं। और दू कहां है बता दें हां बताओ | मेरे हुदण्के गहरेसे गहरे भंतःस्थठमें बिराज गन है।




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