भूरसुन्दरी विद्या विलास | Bhoorsundari Vidhya Vilas

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Bhoorsundari Vidhya Vilas by जयदयाल शर्मा शास्त्री - Jaydayal Sharma Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथम-अ्रकरणण ७ #चाभता किक कक कमल क शक का जा की जन लक के के की के है हे हे हक विवि वि वि वि च#ा चर व्योमयान सतमो प्रैवेयक वंश इछाकु धरे । च्यवन प्रभू फागुन सुदि ाठम ध्यावत मोद भरे ॥। जापर सम्भवनाथ ढरे ॥ ४ ॥ जनस लियो मिगसिर सुदि चौदस सुर नर मोद भरे । ताहिमास की पूनम तिथि को दीछा सौम्य धरे ॥ जापर सस्भवनाथ ढरें ॥ ६ ॥| कातिक कृष्णा पॉचम लीन्हों केवल ज्ञान वरे ) सास समण तपसा मुर्कि श्री गिरि सम्मेत बरे ॥ जापर सम्भवनाथ ढरे ॥ ७ ॥ सहस एक मुनि संख्या श्रभु की द्रशन सोद मरें । सम्भवनाथ सुमिरि ले जिवड़ा तुरतहिं. पार करे ॥ जापर सम्भवनाथ ढरें ॥ ८ ॥। तारे नाथ अनेक सविक जन सोच्छ सुभोद मरे । धन्य घन्य है प्रभुवरजी को ध्यावत तुरत ढरे ॥ जापर सम्भवनाथ दरें ॥ ६ ॥ ढरि ढरि के प्रभु तारे अनेकहूँ अब किमि देर करे । करहु दया अब भूराँ दासी टेरि पुकार करें ॥ जापर सम्भवनाथ ढरें ॥ १०॥.... श्री झमिनन्‍्द्न नाथ-एतवन ( गज़ल 1 अरे इकदम न हो ग्राफिल ये दुनियां छोड़ जाना है ॥। बगीचे छोड़ कर खाली ज़मी अन्दर समाना है ॥ १ ॥ बदन नाजक गलो जैसा जो लेटे सेज फूलों पर ॥ होगा एक दिन मुरदा यही कीढ़ों मैं खाना है ॥ २॥ १--विमान । २--सुन्दर ।




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