श्रीमन्त्रराजगुणकल्पमहोदधि | Srimantrarajgunkalpamahodadhi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विपयचारों शुद्ध ध्यानों के अधिकारी-विपयाचुक्रमणिकाः~ निश्चल भंगः को ध्यानत्त्द *अन्य योगी-ध्यान-दैतुप्रथम शुक्र ध्यान का आलरूम्बन अन्तिम दो ध्यानों के अधिकारीयोग से योगान्तर प गमनसंक्रमण तथा व्यान्रुत्ति पूणीस्याखी योगी कै गुण~~ ००५৬৪৪৬11)७०७००৬০ ৮৮৬_अविचार से युक्त एकतव ध्यान का स्वरूप -*-मन का अपणु में स्थापन मनः स्थैर्यं का फल _.ध्यानाग्नि के प्रडबलित होने पर योगीन्द्र को फर प्राति तथाउसका महत्व , _৬৬৮৬৮৮৪111१०७1;००४कर्मो की अधिकता होने पर योगी को. समुद्घात करने की- आवश्यकता दण्डादि का विश्वानदृएडादि विधानके पश्चात्‌ ध्यान विधि तथा उस का फल.००५৬ ৬৮৪००० =९ ०४५धचुमव सिद्ध निम तन्वा कणन *** चित्त के विश्षिप्त आदि चार सेद्‌ तथा उन का सरूप ˆ` 'निरारूस्त्र ध्यान सेवन का उपदेश व उस को विधि *९* चहिरात्मा व अन्तरोत्माका खरूप ***- परमात्मा का खरूप [व्‌ श योगी का कत्तेंड्य आत्मध्यान का फरले०५० 4.४ 117)तत्त्वज्ञान प्रकर होने का हेतुशुरुसेवन की आज्ञा. शुरू-महिसा নতशुत्ति का ओौदाद्लीन्य करना --` सद्भूदप तथा कामना का त्यागभोदासतीन्य महिसा '-৯ গগহ०४०००१००१७१०চে৮৪১৬)पृष्ठ ले पृषठतन्छःदर श्रय হু १२२ शय यद ९२३ शद १२३ १२३ ९२३यद१२ १२६ १२६ १२७ १२७ १२८ १२८ १२८ १२८ १९८ १९८ १९६ १२६ १२६ १२६१९६.५१२७१२६




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