श्रीमन्त्रराजगुणकल्पमहोदधि | Srimantrarajgunkalpamahodadhi
श्रेणी : साहित्य / Literature

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutJaydayal Sharma Shastri
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
296
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about जयदयाल शर्मा शास्त्री - Jaydayal Sharma Shastri
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)विपयचारों शुद्ध ध्यानों के अधिकारी-विपयाचुक्रमणिकाः~ निश्चल भंगः को ध्यानत्त्द *अन्य योगी-ध्यान-दैतुप्रथम शुक्र ध्यान का आलरूम्बन
अन्तिम दो ध्यानों के अधिकारीयोग से योगान्तर प गमनसंक्रमण तथा व्यान्रुत्ति
पूणीस्याखी योगी कै गुण~~
००५৬৪৪৬11)७०७००৬০
৮৮৬_अविचार से युक्त एकतव ध्यान का स्वरूप -*-मन का अपणु में स्थापन
मनः स्थैर्यं का फल _.ध्यानाग्नि के प्रडबलित होने पर योगीन्द्र को फर प्राति तथाउसका महत्व , _৬৬৮৬৮৮৪111१०७1;००४कर्मो की अधिकता होने पर योगी को. समुद्घात करने की- आवश्यकता
दण्डादि का विश्वानदृएडादि विधानके पश्चात् ध्यान विधि तथा उस का फल.००५৬
৬৮৪०००
=९
०४५धचुमव सिद्ध निम तन्वा कणन ***
चित्त के विश्षिप्त आदि चार सेद् तथा उन का सरूप ˆ`
'निरारूस्त्र ध्यान सेवन का उपदेश व उस को विधि *९*
चहिरात्मा व अन्तरोत्माका खरूप ***- परमात्मा का खरूप
[व् श
योगी का कत्तेंड्य
आत्मध्यान का फरले०५०
4.४
117)तत्त्वज्ञान प्रकर होने का हेतुशुरुसेवन की आज्ञा.
शुरू-महिसा নতशुत्ति का ओौदाद्लीन्य करना --`
सद्भूदप तथा कामना का त्यागभोदासतीन्य महिसा '-৯
গগহ०४०००१००१७१०চে৮৪১৬)पृष्ठ ले पृषठतन्छःदर
श्रय
হু
१२२
शय
यद
९२३
शद
१२३
१२३
९२३यद१२
१२६
१२६
१२७
१२७
१२८
१२८
१२८
१२८
१९८
१९८
१९६
१२६
१२६
१२६१९६.५१२७१२६

User Reviews
No Reviews | Add Yours...