लाल चीन | Lal Chin

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Lal Chin by रामवृक्ष बेनीपुरी - Rambriksh Benipuri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सेलक के दो शब्द इस पुस्तक का एक छोटा-सा इतिहास मे । साई जयभकाश जो स्वास्थ्य-सुधार के छिप पिछली गर्मियों मे सालाबार जाने की सेयारों में थे । एक टिन हम दोनों साथ जा रहें थे 1 उनके हाथ से एडगर समो की रेड स्टार भोषर चाइना नाम की पुस्तक थी | प्रसंगनवधा जापने उसकी तारीफ शुरू की और कहा इसे मालाबार छिये जा रहा हू और इसे हिस्दी-रूप देसे की कोशिश करूँगा । मैंने कया नह काम मीं जच्छी तरह करूंगा जाप चहाँ से साम्यवाद सामक अपनी अधुरी हिन्दी मौलिक पुस्तक को ही पूरा कर खाें । जयप्रकाक जी को साम्यवाद अमी सके पूरा नहीं हुआ मेरा गाल चीन जापके दाधों में है । सकी नीच जरूर ही एशगर रनों की पुस्तक है किन्तु पुस्तक का सिकसिला निपय विभाजन शैली मापा सब सेरे हैं । पुरानी नींव पर एक नई इसारत समझिये । एडगर रंगों में जहाँ से जएनी कहानी झुक की है उसके पहसे की कथा भी मैंने कई पुस्तकों के आधार पर है दी है । फिर चह शुस्तक जिस समय तक की खबर रखती थी उसके बाद की शटनारं काफी महत्वपूर्ण हुई जिनका समावेश भी जरूरी था। इसमे श्रीससी एम्स स्मेडले की चाइना फाइट्स बैक पुस्तक से ही नहीं पश्नपशिकार्जों की कतरनों से भी मदद ली है और मैं दावा कर सकता हूँ मेरी यह सुस्तक बिल्छुछ जप-दु-डेद है सदन कद के संम्पादक भाई पूरनयस्दली जोगी से एस यर्रिकार्की की फतरनों से मदद की और भाई सुल्कशाज आमम्दें ने कुछ सायपयक साई दी 1 इसके लिए में उनका छतश हूँ 1... साई जयअकाद मी ने सूमिका में काठ चीन के महत्त को .बतामा .




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