भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण | Bhartiya Samaj Ka Aitihasik Vishleshan

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Bhartiya Samaj Ka Aitihasik Vishleshan by भगवत शरण उपाध्याय - Bhagwat Sharan Upadhyay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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लि गए का .यूघभूसि के दो झवयव और हें--तुलनात्मक भाषा-विज्ञान और तुलनात्मक घमनशास्त्र । इस प्रकार. चूंकि प्रकृति. और सानव- प्रयासों के विविध अंगों के अनुशीलन के लिए तत्तद्विपयक विज्ञान बन गए हैं इतिहास का क्षेत्र सभ्य-काल सें किए सानव-प्रयासों का दही रह जाता है। . .... इतिहास सानव-प्रयास से संधटित घटनाओं का होता है। . सानव-संघटित घटनाएं ही इतिहास के अंग हैं इतर नहीं घटनाएं क्यों घटती हैं ? सचुष्य प्रयास क्यों करता है ? आदम के प्रति भगवान के दिए अभिशाप की पूर्ति के झाथ--पेट के लिए ।. प्रकृति अन्य प्राणियों की माँ त ही मनुष्य पर भी कुछ _ब्यनिवाय आवश्यकताओं का अनुबन्ध डालती है इन्हीं झाव- - श्यकतादओं की पूर्ति के निमित्त मनुष्य प्रयास करता है । परन्तु न मनुष्य स्वतंत्र है न उसकी परिस्थितियाँ और आवश्यकताएं ञ्और न उसके प्रयास ही । वह साता-पिता के छुटुम्ब में उत्पन्न होता है और प्राय उनकी कपा से नष्ट होने से बचता है। इस कारण स्वभाव से ही वह यूथा चारी होता है और समुदाय-प्रवृत्ति से ब्याचरण करता है । उसकी यह प्रवृत्ति एक ससाज ( चाहे इसका रूप कितना भी प्रारंभिक क्यों न हो ) का सृजन करता है। यही ससाज कालान्तर में प्रबल अपनी इकाई व्यक्ति मचुष्य- से कहीं प्रबल हो उठता है ओर उसका सारभूत कृत्रिम रूप मनुष्य के प्रयास की प्रगति तथा उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों तक में नैसर्गिक परिवतेन करने में सक्षम होता है । मानव छावश्यक- ताएं इस प्रकार कालान्तर सें अपनी कत्रिम सासाजिक परिस्थि- तियों के वशीभूत हो उनके द्वारा. मात्रा और फलतः गुण में _ग्रभावित होती हैं। उनके रूप तक में झधिकाधिक परिवतेनर होता जाता है। इन्हीं झावश्यकताओं की पूर्ति के प्रयास में




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