ऋग्वेद के दार्शनिक सूक्तों का आलोचनात्मक अध्ययन | Rigved Ke Darsanik Sukton Ka Alochatnamac Adhayan

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Rigved Ke Darsanik Sukton Ka Alochatnamac Adhayan by मुरली मनोहर पाठक - Murali Manohar Pathakहरिशंकर त्रिपाठी - Harishankar Tripathi
लेखक : ,
पुस्तक का साइज़ : 52.57 MB
कुल पृष्ठ : 337
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मुरली मनोहर पाठक - Murali Manohar Pathak

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हरिशंकर त्रिपाठी - Harishankar Tripathi

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(क) .. दर्शन शब्द की व्याख्या मनुष्य एक विचारशील प्रापी है । विचारशीलता उसका अवियोज्य आकस्मिक गुण है । वह संसार में जिस किसी पदार्थ अथवा घटना को देखता है उस पर अवश्य ही विचार करता है । यह विचारशीलता ही उसे पशु से भिन्न करती है और दर्शन को जन्म देती है । दर्शन शब्द की निष्पत्ति दूश धातु से भाव के अर्थ में ल्युटू च (अष्टा.3.3.115 ) इस पाणिनीयसूत्र के द्वारा ल्युट प्रत्यय के योग से हुई है । अतः इसका अर्थ देखना हुआ । इसका एक अन्य अर्थ - दृश्यते अनेन इति दर्शनम्‌ अर्थात्‌ जिसके द्वारा देखा जाए वह दर्शन है होता है । इस प्रकार दर्शन का अर्थ देखना और देखने का साधन दोनों सिद्ध होते हैं । दूसरे अर्थ में दर्शन दृष्टि को कह सकते हैं । महाकवि कालिदास ने इसे इसी अर्थ में प्रयुक्त किया है । चिन्ताजंडं दर्शनमू आचार्य यास्क ने भी दृष्टि शब्द का प्रयोग दर्शन के अर्थ में किया है । योगवाशिष्ठ में भी दृष्टि का प्रयोग इसी अर्थ में किया गया है । दृष्टि हो जाने के उपरान्त मनुष्य कुछ देखेगा - प्रत्यक्ष करेगा । यही प्रत्यक्षीकरण दर्शन के प्रथम अर्थ को चरितार्थ करता है । इसके भी दो स्वरूप हो सकते हैं - प्रथम इन्द्रियजन्य तथा द्वितीय अन्तर्दृष्टि द्वारा अनुभव तात्पर्य यह है कि अभीष्ट अर्थ का प्रत्यक्ष चक्षुरादि स्थूल इन्द्रियों तथा अन्त करण की सूक्ष्म वृत्तियों से भी हो सकता है । इसी पप्रत्यक्षीकरण की क्रिया द्वारा ऋषियों का ऋषित्व प्रमाणित होता है । उन ऋषियों ने स्वयं धर्म का साक्षात्कार कर अन्य लोगों को उसका उपदेश दिया 1 यहाँ धर्म का अर्थ धर्मविशेष न होकर जगत के मूलत्त्व से है । अब प्रश्न यह उठता है कि ऋषि या सामान्य जन किस तत्व का प्रत्यक्ष करते हैं ? वह तत्व सार्वभौम होना चाहिए । उसमें अन्य सभी अर्थों का अन्तर्भाव भी होना चाहिए । इस प्रकार विचार करने से यह प्रतीत होता है कि सत्य व व व व व व कह ननवनलनिनकन कदम लता सदन पवार सल्वरव 1. अभिज्ञानशाकुन्तलम्‌ - 4.8 2. ...... एवमुच्चावचेरभिप्राये ऋषीणां दृष्टयो भवन्ति । यास्क निरुक्त - 7.1.4 3. ततोइस्मदादिभि प्रोक्ता महत्यो ज्ञानदृष्टय ।. योगवाशिष्ठ - 2.16 4... ऋषिदर्शनात्‌ । यास्क निरुकत - 2.11 साक्षात्कृतधर्माण ऋषयों बभूवु । तेडवरेभ्यो5साक्षात्कृतधर्मेभ्य उपदेशेन सम्प्रादु । वही - 1.20.




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