हिंदी मुक्तावली | Hindi Muktavali

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Hindi Muktavali by अयोध्यानाथ शर्मा - Ayodhyanath Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ज] ३-सशोर उठो-उठो अब प्यारे ब्यो, हुआ मनोहर भोर ! । स्वर्ण-सरीखा पीला गोला, लखो पूर्व की ओर ॥ ' देखा, इसे देखकर ही सब, नर, पथ, पष्ठी-मोर- आतम छोड़ कुतृहल में पर, करते हैं सूद शोर 1 रही नहीं अब शान्तिमयी निधि, दूर हुआ तम पार 1! सारे तारे छिऐ लजा कर, देख सूर्य की कोर ॥। देग्दे, गायें यछद़ लेने, चतीं विपिन की ओर । चलने लगे चटोही भी अब, इुआ जान कर भोर 1! अच्छे लदके मुंद भोने को. चड़े नदी की ओर । कई पाठ पते हैं अपना, सुन लो उनका सर ॥। फिम्तु युरे लड़कों पर अप नक, छाई निद्रा घोर 1 उठने नहीं उठाने पर भी, लोग रहे धशसोग 11 देखो, श्रापय साथ आदि सब, खरे उमयन्फर डोर! ७ ० ड््ि पेय के सम्पुय होकर, करने विनय अयोर्॥ दी और नालों के नंद पर. मैदानों की थोर नद्रा पतला शुद्ध चापू बहता हूं, टरव मनाहुर न दे यहीं दायु हैं इद्धि ददू 4; # हा रथ ड् शव नर श्भ नाक. बन जय हे गे त्| ( हु री न चभ तय 1 मन में सुर, उन्नाह, चहुर्ता, मर्दों लिन्द दटोर शत ध्व नशे लि




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