हिंदी मुक्तावली | Hindi Muktavali

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Book Image : हिंदी मुक्तावली  - Hindi Muktavali
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ज] ३-सशोरउठो-उठो अब प्यारे ब्यो, हुआ मनोहर भोर ! । स्वर्ण-सरीखा पीला गोला, लखो पूर्व की ओर ॥ ' देखा, इसे देखकर ही सब, नर, पथ, पष्ठी-मोर- आतम छोड़ कुतृहल में पर, करते हैं सूद शोर 1 रही नहीं अब शान्तिमयी निधि, दूर हुआ तम पार 1! सारे तारे छिऐ लजा कर, देख सूर्य की कोर ॥। देग्दे, गायें यछद़ लेने, चतीं विपिन की ओर । चलने लगे चटोही भी अब, इुआ जान कर भोर 1! अच्छे लदके मुंद भोने को. चड़े नदी की ओर । कई पाठ पते हैं अपना, सुन लो उनका सर ॥। फिम्तु युरे लड़कों पर अप नक, छाई निद्रा घोर 1उठने नहीं उठाने पर भी, लोग रहे धशसोग 11 देखो, श्रापय साथ आदि सब, खरे उमयन्फर डोर!७ ० ड््िपेय के सम्पुय होकर, करने विनय अयोर्॥ दी और नालों के नंद पर. मैदानों की थोरनद्रा पतला शुद्ध चापू बहता हूं, टरव मनाहुरनदेयहीं दायु हैं इद्धि ददू4;# हा रथ ड् शवनर श्भ नाक. बनजय हे गे त्| ( हु री न चभ तय 1मन में सुर, उन्नाह, चहुर्ता, मर्दों लिन्द दटोरशत ध्व नशे लि




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