गद्य-मुक्तावलि | Gadya Muktavali

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्र पक्तपात के फल खरूप उदू की उन्नति हिंदी से पहले आरभ हो गई । सपत्‌ १८६० में उद्‌' का पहला समभाचार-पत्र दिल्‍ली से निरुला | इस स्थिति में भी हिंदी के समर्थक अपनो भाषा/की रक्षा में तत्पर दिखाई पडते हैं। राजा शिवप्रसाद ने स० १६०२ में बनारस अखबार! निऊाला | इसकी भाषा उदू थी--ज्योंकि उस समय के समाचार पत्रों के पाठ अविऊतर उ्द' जानमे वाले ही होते थे--फिंतु पह लिसी देवनागगक्तरों में जाती थी। बीच- चीच में उसमें हिंदी के शब्द भी होते ये किंतु उतने नहीं, जितने आजकल पजञाय के आर्यसमाजी उदय पन्नों में होते हैं. उसकी भाषा की एक झतऊ देंखते चलिए-- यहा यो नया पाठशाला कई साल से जनाब कप्तान किट साहय चहादुर के इदतिमाम शार धर्मात्माथ। के मदद से बनता है. उसका हाल फई दफा शादिर हो चुहा है। भ्रम घह सकाव एक श्ालीशान बनने या निशाना तैग्रार दर चेदार तरफ से होगया बिक इसके नकरे का बयान पदिले मुल्ज है सो परमेश्यर की दया से साइन बहादुर ने “बड्ढी तम्देढ़ी मुस्तेदी से यहुत बेडतर और माकुच् बनवाया हे । चार-पाँच बष बाद काशी से छुवारफा निकाला गया। एक बंगाली सत्न इसके सपादक थे। इसकी भाषा 'बनाश्स अखयगार से सुबरी हुई होती थी | इन्ही दिनों स० १६०६ से आगरे से 'चुद्धिप्रकाश! तिकला । इसके सपादक मु शी सदासुख- लाल थे | इसकी भाषा की भी चानगी देख लेना चाहिए-- स्लित्रो में सतोप और नन्नवा और भीत यह सर गुण करों ने उत्पन्न किए है, केबल विद्या को न्‍्यूनता है जो यट्ट भो दो तो ख्ियाँ




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