अध्यात्म रोगों की चिकित्सा | Adhyaatm Rogon Ki Chikitsa

Adhyaatm Rogon Ki Chikitsa by इन्द्र विद्यावाचस्पति - Indra Vidyavanchspati

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भ्रध्यात्म रोगों की चिकित्सा श देही भोकता श्रादि श्रनेक नाम है । वह मोकक्‍ता हो अपने प्रहमू में जैसे साधिकार शब्दों का प्रयोग करता है। जोवात्मा सब श्रनुभुतियों का केन्द्र है । वह साधक है दारी- रादि उसके साधन है । कठोपनिषद्‌ मे भोकता ( जीवात्मा ) के सम्बन्ध से कहां गया है-- भ्रात्मान रथिनं विद्धि शरीर रथमेवतु । बुद्धि तु सारथि विद्धि मनः प्रग्रहमेव व ॥। इन्द्रियाणि हयानाहुविषयांस्तेषु गोचरान्‌ । झात्मेन्द्रिय मनोयुक्त॑ भोक्‍तेत्याहुर्मनी षिणः । कठ. १. ३. दे. ४1 इन काररिकाप़ों मे रथ के ग्रलंकार द्वारा भोकता गौर उसके साधनों का बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। दारोर रथ है । इन्द्रियां उसमें जुते हुए घोड़े हें वे विषयों की श्रोर भागते हैं । बुद्धि सारथि है जो मन रूपी रस्सियों से घोड़ों को वद में रख सकता है । इस क्रियाशील रथ का मालिक भ्रात्मा झरीरी भ्रादि नामों से पुकारा जाने वाला भोकता है। उसे हम इस ग्रंथ में उसके प्रसिद्ध और सार्थक जोवात्मा इस नाम से निर्दिष्ट करेगे । शरीर श्रौर इन्द्ियें तभी तक काम के लायक रहती हे जब तक वे जीवात्मा के साथ रहती हैं। जीवात्मा के श्रलग होते ही उनकी वही स्थिति हो जाती




User Reviews

  • ईपुस्तकालय

    at 2019-10-14 18:28:34
    Rated : 4 out of 10 stars.
    atharvaveda
  • jck

    at 2019-10-13 15:54:37
    Rated : 4 out of 10 stars.
    "Original source of book"
    Can you please tell me from which veda this book was inspired by or the original source of this book????
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