अक्षयनिधितप विधि तथा श्रीपोषध - विधि | Akshayanidhitap Vidhi Tatha Shriposhadh Vidhi

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Akshayanidhitap Vidhi Tatha Shriposhadh Vidhi by मुनि विद्याविजय - Muni Vidyavijay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ह५ ) जोर दनीय चर्प में उसरोत्तर सामान्य दिधि से योर चतुर्थ थर्प में विशेष विधि स साराघन किया 1 सप के पूर्ण होने पर यद्दों विद्याघरसों वा एक समूदद क्रीडार्थ भाया उसमें चद विद्याघर मी था-जिसने पदले सर्पद्धि के साथ दादी की थी । कई दिनों के याद प्राप्त अपनी प्रियपनी सर्वद्धि थी यदद अपन थत्त पुर में छे गया च्दों यदद आनन्द से रदमे छगी | चिद्याघर के साध्रय में रद कर सप्धिनि अक्षयनिधि तप थी आराधना यड़े समद्ध माव से की । उसीके प्रभाव से मर घर हु समरदोठ की सुन्दरी ? नामक पुभ्नी हुई दे यूर्च भव में अक्षयनिधि तसपाराधन करने से तेरे को स्थान-स्थान पर निधान दौर यदा घाप्त हुआ दे । शुरू के मुगारपिन्द से अपना पूरप-मय खुन कर सुन्दरी यो ज्ञातिस्मरणशान हुआ उससे उसने अपने एूवमघ पा स्यरूप यथायत्‌ देखा । प्रसझ चित्त से शुद्ध को घदना करवे सुस्दरी अपने घर माई और उसने समृद्धमाव पव पिशाल सय से अक्षयनिधितप का प्रारम्म किया । उसमें अनेक शजा मप्नी राणी सेठ सामत आदि लोग भी शामिठ हुए । त्तपाराघना में सुःदरी के उदार दिल को देख कर लोगोंनि उसका नाम अक्षयनिधि रखा और बंद उसी नाम से सच प्रसिद्ध हुई । देवताओंने भी प्रसन्न दोयर उसके ऊपर पुष्प-चूष्टि थी । इस प्रकार सानद सुखमोग करते हुए सुन्दरी को दिव्य-स्परूप चार पुत्र भर चार पुधियों की प्रासि हुई । अन्त में विपय-चासना से विरक्त दोकर खुन्दरीने भागवती दीक्षा ली । उसका भले प्रकार परिपालन कर और झुकध्यान से घनघाती कर्मों का नादा कर उसने कवल शव पाप किया । अवशिषट आयु पूर्ण दोने पर -




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