गीता सार | Gita Ka Sara(shrimadbhagwatgita Ke Adhyaye)

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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|| 55 शीपरसाध्मने नम: !) माकथन व, स्वेष्टे प्राप्य समायंधाम ससयादड्ो 5प्यविन्दच्छियम | याता सुक्तिमजासिलादिपतिताः शेलो5पि पूज्यो5भवत्‌, ते. श्रीमाधवमाशितेटद्सद सित्य शरण्यं भजे ॥! पजिन करुणासिन्घु भगवान्‌की करुणाके लेश्मात्से चालक घुवने इष्ट वस्तुको प्राप्त करके श्रेष्ठ पुरुषोंके लोककों प्राप्त किया, दीं सुदामाने लकमीकों प्राप्त किया, अजामिल आदि पापियोने मुक्तिको प्राप्त किया और गोबध॑ पर्वत भी पूज्य वन गया ( इस तरह बालक, दर्द्री, पापी और पत्थरका भी उद्धार हो गया ) उन शरणागत भक्तोंकों इ्ट पदाथ देनेवाले शरण्य मगवान्‌ माधवकों नित्य भजता हूँ ।” गीताकी महिमा श्रीमड्ूगवट्ीताकी महिमा अगाथ और असीम है । यह मगवदूसीता-ग्रन्य प्रस्थानत्रयमें माना जाता है. । प्रस्थानत्रयका अथ है कि परमात्मतस्तकी प्रापतिमें जितने साग हैं, उनको बतानेवाले उपनिंषदू; नहासुत्र और मगवदूगीता---यें तीन हैं | ठड़ुशचाय, रामालुजाचाय, चल्लमाचाय, निम्बार्काचाय आदि जितने आचार्य हुए है, उन्होंने अपने मतको सिद्ध करनेके लिये इन तीनोके ऊपर माष्य लिखे हैं; इसी कारण जनताने उनके मतोकों खीकार किया है | सी० खा० रै-कन-




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