बिहारी बिहार | Bihari Bihar

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Bihari Bihar by अम्बिकादत्त व्यास - Ambikadatt Vyas
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 27.1 MB
कुल पृष्ठ : 388
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अम्बिकादत्त व्यास - Ambikadatt Vyas

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4. 2. 3. कै. 3... 3... सै कै ै- जम कै कै कै लैत्लै-जै-ै-मै-सै-औैसै- कैट ( दड ) लिन दिलटेव नू ऐसे कुतर्कन में सब की सति यौंदी फिरे भठकी । हमंद चले किन भोरी भटू पग लाखन कौ अखियाँ अटकी ॥२॥ इनकी रचित अड्रकर चालौसी में भी अच्छो कविता है उदाइरणार्थ छुक्त उदुत की लाती है -- आज सणिमन्दिर सनोजमद चाखें दोऊ लगनि लगालगि के सगन सजेज पर | दिलदेव ताईं पैं टुद के अलि आनन की दनी टति दै रही तसीपति के तेज पर ॥ मेसफ़ सम्हारि छत्त वलन छरा को वन्द पीढ़ि रहे पानि घरि कमल सलेज पर कऋठे रति समर छपा को सख लटि टोअ नोदे रति सदन उनीदे परे सेज पर ॥३०॥ खेद कढ़ि आयो वढ़िआयो कछ्ू कंप सुखद तें अति आखर कढ़त अरस लगें । ह्विजदेव तैसें तन तपत तँट्रन तें तपत तँटूर से सरौर भरसे लगे ॥। एते थे तिहारी सौ तिहारे विन श्यास वास नेननि तें ऑआसूदू सरस वरसे लगे । एक रितुराज कालुह आयो ल्जमाहिं आज पौचो रितु प्यारी के सरीर दरसे लगे ॥ वाचत न कोऊ अब वेसिये रहति खास जुवती सकल जानगडई गति वाकी है । भूंठ लिखिवे की उन्हें उपले न लाज केदूं जाय कुबिजा के वसे निलजन तियाकी है ॥ दूसरी अवध दिलदेव राधिका वो आगे वौच कौन नारि लौन पोढ़ छतिया की है। ह ऐसी सुखागर कहो सो कहों ऊधो इी उठि गई. ब्रज तें प्रतीत पतिया की है ॥ अब मति दे री कान कान्ह की वसीठिनि पे भूठे भूठें प्रेम के पतीवन कॉं फेरि दै । श्य उरभि रहीती जो अनेक पुरिपातें सोऊ नाते की गिरह मूदि नैननि निवेरि दे ॥ पे | टलिअर्वसकलरर न्डै. दा फू पूनडू डू सास झूक ड ड या फकऊ रुक इडाशफकफकउ कक मरन चहत काइू ऊैल पें छवीली कोऊ हाघन उँचाय न्रन. वीधिनि से .टेरि दै । नेह री कहां को जरि ख़िहरी भई तो मेरी देह री उठाय वाकी देहरी मैं गरि दै ॥ .. हि इनके सभा पण्डित स्ीलगन्नाव कवि ने कौर्ति सुक्तावली नामक संस्ठत में एक छोटा सा १४६ ही झोकी का ग्रन्थ चनाया है । उसमें महाराल का इतिहास पर वन लिखा सै पर बच गन्य इतिडास टड़ नहीं है काप्य ठड् पर है । परम कारण संवत भ्रादि का कहीं पता नहीं लगता ॥ संयत १८२ ्द्में ३ रायसंगर में इसे के सो एस भ्राई का पद टिया घा ॥ यों अत्टन्त प्रतिदापुर्वक राव्यशासन कर सं० १८.२७ सें दे भ्रयोध्यानरिग महाराज मानसिंद इस पर सार संसार को कोड सुरघाम पघारे । जैसा कोर्ति सुक्तावसी के भ्रन्त में चिप्त झोक है। सप्तदय्रडूशणा इवत्सरवरे यास्यायने याम्यमे पर घीज मासि सितेडपरान् समय भोमे दितीयान्विते | कडड़डउकपपउडउउउउकडडडरररदश इफकफकफकफकउडरड्फड़्क फककफककफ 4. 4. अं. दे ज 3 ऊँ. अं. ऊँ. जैज ऊँ... ऊँ 3. 3. ऊ. ज ऊँ ऊँ ऊँ उैं ऊँ जैक ऊँ ऊँ ऊँ प्‌ ् थे डक




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