मानसरोवर भाग ६ | Mansarowar Part Vi

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Mansarowar Part Vi by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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न राजा दरदौल श्ट्ू तेरे दर्शन होंगे । राजा मंजिलें मारते चले आते थे, न भूख थी, न प्यास, श्रोरछेवालों की मुद्दब्यत खींचे छिये श्राती थी । यों तक कि ओरछे के जगलों में आ पहुँचे । साथ के आदमी पीछे छूठ गये । दोपहर का समय था | धूप तेज़ थी। वे घोड़े से उतरे और एक पेह़की छाँद में जा वेठे । माग्यवश आज दरदौल भी जीत की खुशी में शिकार खेलने निकले थे । सैकड़ों बुन्देला सरदार उनके साथ थे। सब अभिमान के नशे में चूर थे । उन्होंने राजा जुकारसिंद को अकेले बैठे देखा , पर वे अपने घमड में इतने डवे हुए थे कि इनके पाप तक न श्रावे । समभा कोई यात्री होगा । हरदोल की ऑखों ने भी चोला खाया | वे घोड़े पर सवार अकड़ते हुए जुक'रविंद के सामने आये और पूछुना चाइते थे कि तुम कौन हो कि भाई से श्आाँख मिल गयो । पहचानते दी घोड़े से कूद पड़े और उनको प्रणाम किया । राजा ने भी उठकर हृरदौल को छाती से लगा लिया ; पर उस छाती में अब भाई की मुद्दब्यत न थी । पुदब्यत की जगदद दर्ष्या ने घेर ली थी, श्रौर बदद केवल इसीलिए, कि हरदौल दूर से नसे पैर उनकी तरफ न दौड़ा, उसके सवारों ने दूर ही से उनकी अभ्यर्थना न की । संध्या दोते-द्दोते दोनों भाई ओरछे पहुँचे। राजा के लौटने का समाचार पाते दी नगर में प्रवन्नता की दुदुमी वजने लगी । हर जगह आनन्दोत्सव होने लगा और वुरता-फुरती ठारा शहर जगमगा उठा । आज रानी-ऊलोना ने अपने दार्थों भोजन बनाया । नौ बजे होंगे । लौंडी ने श्राकर कद्द--मददाराज, भोजन तैथार है । दोनों भाई भोजन करने गये | सोने के थाल में राजा के लिए; भोजन परोसा गया श्र चॉदी के थाल में दर- दौल के लिए; । छुलीना ने स्तय मोजन बनाया था, स्वयं थाल परोसे थे श्र स्वय ही सामने लायी थी; पर दिनों का चक्र कद्दो, या माग्य के दुर्दिनि, उसने . “मूल से छोने का थाल दरदौल के श्रागेरख दिया और चाँदी का राजा के सामने ) हृरदौल ने कुछ ध्यान न दिया, चद्द वर्ष मर से सोने के थाल में खाते-खाते उसका आदी दो गया या; पर जुकारलिंद तलमला गये । जवान से कुछ न बोले; पर तोवर बदल गये और मुँद लाल दा गया । रानी की तरफ घूमकर देखा और भोजन करने लगे । पर आस विष मालूम होता या । दो-चार थास खाकर उठ श्राये । रानी उनके तीवर देखकर डर गयो । आज केसे प्रेम से उसने




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