संक्रामक रोग विज्ञानं | Sankramak Rog Vigyan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ही (१२) ः घमकायों का अघुष्ठान महामारियों का प्रकोप अधर्मंजन्य है--ऐसी आर सम्मति है । अतः धघर्मे- कृत्य, यज्ञानुष्ठान, हवन; घर्मोपटेश, स्वास्थ्योपदेशा श्रद्नति कार्य सक्रामक रोगों का निरोधक उपाय है। क्योंकि हवन से वायु थुद्ध होता है और जीवाणु नष्ट होते हैं; भारोग्य एवं वछ की प्राप्ति होती है तथा प्राणप्रद (0:5.8००) युक्त .. सुगन्धित वायु उत्पन्न होता है जिससे जीवनी-दक्ति प्राप्त होती है। अथर्ववेद में युगगुछु की ' धूप से यक्ष्माणु के नष्ट होने का उपदेरा है। यज्ञ ऋतु-सचियों में करना चाहिये ! क्योंकि प्राय- ऐसे हीं समय रोग दोते हैं । यथोक्तमथवंवेदे-- अज्ञात्‌ यक्ष्मातू उत्त राजयक्ष्मात्‌ त्वा मुंचामि म० १ ,.... तस्या: ( ्राद्या: ) इन्द्राी एनं अ्रभुमुक्तमू म० ? भपव्या यज्ञा वा एते।. तस्माद्तुषु संधिघु अयुज्यन्ते ऋतु संघिषु व्याघिर्जायते । -. गो०, ज्ञान हे प० १; १६ चुरकेप्युक्तपू-- क सं कथा धघर्मशाख्राणां महर्षीणां जितात्मनामू । घार्मिके: सात्विकेर्नित्य॑ सहास्या बृद्धसंस्मते: ॥। इत्येतदू भेपजं श्रोक्तमायुष' परिपालनम्‌ । येषामनियतो मृत्युस्तस्मिद काले सुदारुणे ॥, खुश्नुताचार्य ने भी मद्दामारी फेलने का प्रधान हेठु अधर्म, यज्ञ का न करना, पाप करना अस्ति लिखा जज 1 दृषित देश, दृषित. जल भर भौषघ भादि के उपयोग से दो श्रकार के रोग पेदा होते हैं। (१) सामान्य.व ( २ ) सरक चनके श्रतीकाराथ स्थान परित्याग, शातिकर्म, आयश्चित्त; मगल, जप; होम; तपस्या; नियम; देवता पूजन आदि सत्काय अन्ुष्ठानादि करना चाहिये । यथोक्तं सुश्रते-- तासामुपयोगादू द्विविधरोंगम्रादुर्ावों मरको वा ' भ्वेदिंतिपुन कदाचिद्व्यापन्नेषुकतुषु॒ कृत्याभिशापक्ो धाधर्मेरुपध्वस्यन्तें जनपदाः चिषीषधपुष्पगन्पेनवायुनोपनीतेनाक्रम्यते यो... देशस्तत्र ' दोपमकर्ति-' विज्षेषेण कास-दवासवमथुम्रतिदयायदिरो रुग्ज्वरेरुपतप्यन्ते, अद-नक्षत्र'




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