जंजीरे और दीवारे | Janjeere Or Divare

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Janjeere Or Divare   by रामवृक्ष बेनीपुरी - Rambriksh Benipuri
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 7.46 MB
कुल पृष्ठ : 284
श्रेणी :
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रामवृक्ष बेनीपुरी - Rambriksh Benipuri

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जंजोरें श्रौर दीवारें 960 9६9६-६७ घ9-9६१६०६०+०६०-०९-७ ७-६७ ७-० ०-७०७-७७-० 00 थी वह न जाने कब कहा खिसक गई नया जत्था तैयार कर मैं सिटी-कोटट तक पहुँचा था कि पुलिस-वान श्रागे घेर- कर खडा हो गया और अभी-ग्रभी वह भव्य-दिव्य सवारी मुक्ते इन दीवारों के नीचे पटककर चली गई है वे दीवारे ये जंजीरे जजीरे खनकती है बोलती है लाल कपडे की पुष्ठ्ुमि में ठगी जजीरे सुक्ते देखकर मुस्कुरा रही हैं वे कब बोल उठेंगी ? सुखर हो उठेगी रब भीतर चलिए इन्सपैक्टर वापस जा रहा है--क्या उसकी ग्राँखो में पानी है ? जमादार साहब भीतरी गेट खोल रहे है--क्या उनकी भ्रगुलिया थरथरा रही है ? अब हम जेल के अन्दर है इन दीवारों ने अरब पूरे तौर से हमे घेर लिया घेर लिया ?--कितने दिनो के लिए ? . मै काप गया इन पत्थर-सी दीवारों के घेरे ने जिस हृदय को थोडी देर पहले पत्थर का बना लिया था उसे मोम- सा पिघला दिया । मै काप गया । श्राज पचीस वर्षों के बाद जब उन स्मृतियो को कलमबन्द करने चला हू तो मैं उसकी कपकपी अनुभव कर रहा हू । यह कपकपी क्यो --यह क्लीवता क्यो भ्रभी कुछ क्षण पहले अपने को पत्थर महसूस कर रहा था यह मोम कहा से पिघल श्राया ? कुछ क्षण पहले भ्रर्जुन सदास्त्र होकर चला था । महाभारत मचाने--फिर यह थरथरी कैसी ? १७




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