आत्म धर्म | Aatma Dharm

Aatma Dharm by रामजी माणिकचंद - Ramji Manikchand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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। + साश्वत सुखका मार्गदशक मासिक पत्र है ः संपादक के 0. ज्येष्द कप ग हे रामजीमाणेकचददाशी प्र २००१९ वकील. . है. सम्यर्द्याटका अतर पारणसन + : चिन्मूत द्रग्धारीकी ' माहि, रीति रगत है असपटी ..चिन्मू, - बाहिर नारकिकत दुःख भागे, अंतर सुखरस गठागटी .. रमत अनेक सुरनि सगंपे तिस, परनतितै नित हटाहटी. . .चिन्मू, १ शान विराग शक्ति से विधिफल, भागते विधि घटावटी सदन निवासी तदपि उदासी, तार आख्व छटठाछरी.. चिन्मू. २ जे भवहेतु अचुधके ते तस, करत बन्धकी झटाझटी हि ' नास्क पु तिय पड विकत्रय, प्रकृतिनकी ले कटाकटी. चिन्मू, ईं, ; सम धर न सके थै संयम,-धारनकी उर चटाचटी था लि कील . ताछु झुयश युनकी दौरुत के, छगा रहे नित रयरटी, ..चिन्मू, ४ कएएए7 नबफण्ण्टएललउठटकबबननणणाणण [यह स्तवन श्रीमंत शेठ सर हुकमीच दूजीने श्री जेन स्वाध्याय भ॑ दिर सानगढ में ता. चौथी व पांचवीं जून के दिन सुनाया था] बन हु है [जी न के जि सम हि गन: अब तरस पतला इलफसलायतदतताथततवतथततपतथ वार्पिक मूल्य - २ एके अंक कक प््स्स्य पगा .. . . पांच आना हि वदददालददलयककददददद कक सयययलप्यध्यकथ्थदयनदथ *'आत्मघम कार्यालय (सुवणपुरी ) सोनगढ़ काठियावाड #




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