आत्म धर्म | Aatma Dharm

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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। + साश्वत सुखका मार्गदशक मासिक पत्र हैः संपादक के 0. ज्येष्द कप ग हे रामजीमाणेकचददाशीप्र २००१९ वकील.. है. सम्यर्द्याटका अतर पारणसन +: चिन्मूत द्रग्धारीकी ' माहि, रीति रगत है असपटी ..चिन्मू,- बाहिर नारकिकत दुःख भागे, अंतर सुखरस गठागटी.. रमत अनेक सुरनि सगंपे तिस, परनतितै नित हटाहटी. . .चिन्मू, १ शान विराग शक्ति से विधिफल, भागते विधि घटावटीसदन निवासी तदपि उदासी, तार आख्व छटठाछरी.. चिन्मू. २जे भवहेतु अचुधके ते तस, करत बन्धकी झटाझटी हि' नास्क पु तिय पड विकत्रय, प्रकृतिनकी ले कटाकटी. चिन्मू, ईं,; सम धर न सके थै संयम,-धारनकी उर चटाचटी थालि कील . ताछु झुयश युनकी दौरुत के, छगा रहे नित रयरटी, ..चिन्मू, ४कएएए7 नबफण्ण्टएललउठटकबबननणणाणण [यह स्तवन श्रीमंत शेठ सर हुकमीच दूजीने श्री जेन स्वाध्याय भ॑ दिर सानगढ में ता. चौथी व पांचवीं जून के दिन सुनाया था]बन हुहै [जी न के जि सम हि गन: अब तरस पतला इलफसलायतदतताथततवतथततपतथवार्पिक मूल्य - २ एके अंककक प््स्स्य पगा .. . . पांच आना हि वदददालददलयककददददद कक सयययलप्यध्यकथ्थदयनदथ*'आत्मघम कार्यालय (सुवणपुरी ) सोनगढ़ काठियावाड #




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