मेरु मंदर पुराण | Meru Mandar Puran

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Meru Mandar Puran by जैनाचार्य देशभूषण महाराज - Jainacharya Deshbhushan Maharaj
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 27.58 MB
कुल पृष्ठ : 564
श्रेणी :
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जैनाचार्य देशभूषण महाराज - Jainacharya Deshbhushan Maharaj

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सेरु मदर पुरारा ७ तथा इनके पुत्र परिवार को समुद्र मे डाजू गा। उस समय श्रादित्य नाम का देव लातव कल्प से परिनिर्वाण पूजन करने श्रागया श्रौर घरणेद्र को क्रोधित तथा विद्य_द ष्ट्र को नागपाश मे बधा देखकर धररोद्र को दयाभाव का उपदेश देना प्रारम्भ किया कि हे घरणेद्र तुम सज्जनोत्तस धरणेद्र हो यह नीच लोग है । इन पर--इतना क्रोध करना ठीक नही इन पर दया करो । इस सम्बन्ध से कुछ कहता हू सुनो । पूर्वकाल में जब वृषभनाथ भगवान तपस्या कर रहे थे उस समय नमि श्रौर विनसि दोनो राजपुत्र आदिनाथ भगवान के पास आकर कुछ माग रहे थे कि हे भगवन्‌ आपने सब का वटवारा कर दिया हम उस समय मौजूद नही थे । श्रब हम को भो हमारा हिस्सा दीजिये । इस प्रकार कहते हुए सगीत रूप मे गाने लगे । तब धररोद्र ने श्रवधिज्ञान से जाना कि ये दोनो भ्रगवान पर उपसर्ग कर रहे हैं । उस धरणेद्र ने भगवान के पास जाकर कान के समीप मु हू लगाया श्रौर उन नमि विनमि से कहा कि भगवान ने मुक्त को कान मे कह दिया है मेरे साथ चलो । तदनतर वह धरणेद्र उनको ले गया श्रौर विनमि को विजयाद्ध॑ पवेत की उत्तर श्रेणी मे साठ नगरियो का ऑ्रधिपति बना दिया श्रौर कनक- पत्लव नाम की नगरी को राजधानी बना दिया । श्रौर दक्षिण श्रेणी की पचास नगरियो का अधिपत्ति नमि को बनादिया आ्ौर रथनूपुर चक्रवाल नगर को राजधानी बना दिया । उन दोनो विनमि आ्ौर नसि को पाचसौ महा विद्या आर सात सौ क्षुल्लक विद्या देकर सब विद्याघरों को बुलाकर कह दिया कि श्रागे से इनकी श्राज्ञा का पालन करो । ऐसा कह कर वहू धरणेद्र श्रपने स्थान चला गया । श्रौर यह भी विनमि से कहा कि यह विद्यू द ष्ट्र तुम्हारे ही पुर्ववश का विद्याघर है । इसलिये उसको नष्ट करना ठीक नही है । इसलिए तुम इन पर क्रोध करना छोड दो । इस बात को सुनकर धरणेद्र ने कहा कि कम रूपों शन्ु को नाश कर मुक्ति गया वह सजयत पूर्वेजन्म का मेरा भाई है । उस पर इसने उपस्ग किया है । मैं इसको नहीं छोड़ गा । तदनन्तर श्रादित्याभ देव कहने लगा कि यह सजयत तुम्हारा एक ही जन्म का भाई था श्र दूसरे भवो मे न मालूम तुम्हारा यह कौन था । तुम इन पर कषाय व क्रोघ मत करो श्ौर कम का बध करना ठोक नही है । यदि विचार किया जाय तो ससार मे .शत्नु सित्र कोई नही है सभी समान हैं । व्यवहार मे शत्रु है श्रौर सित्र है । निश्चय से इस श्रात्मा का कोई शत्रु व मित्र नही है । इसलिए ज्ञानी सज्जन लोग राग द्वेप नही करते है । एक जन्म मे हुए उपसर्ग को देखकर तुम इतना क्रोध करते हो तो पहले भव मे उसने कितने भवो मे इसको दुख व कष्ट दिये होगे । उस समय तुमने क्या किया यह विद्य.ह ष्ट्र पूर्वें भवो मे राजा सिहसेन महाराज का सत्यघोप नाम का मची था । राजा ने उस मत्री के मायाचार करते समय कुछ दण्ड दिया था । उस वर विरोध के कारण क्रोधित श्राज तक जन्म २ उपस्ग करता श्राया है । इन महामुनि ने शात स्वभाव से उपसर्ग सहकर सद्गति प्राप्त की । और ग्रन्त मे मोक्ष पद को प्रास किया । भ्रौर विद्याघरों ने उपस्गं करके पाप व अपकीर्ति प्राप्त की । इस कारण क्रोध तथा क्षमा का फल ऑ्रापने भली भाति देख लिया । इसको अपने हृदय मे घारग्ण करो ।




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