सरस्वती चन्द्र | Sarasvati Chandra

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Book Image : सरस्वती चन्द्र  - Sarasvati Chandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दुरर परिच्छिद ननसइ टाउन चुद्धिघनका छुदुम्ब 1 ८. हि नचन्द्र चरीचेसें गया । दू्खद्चने कोठरीसे ज्ञा जार - इड्दड ् जलायी,मास-पास घप का शुन्यार देध गया | इसी डी समय घोहॉको टापोंकि साथ गाड़ीकी गड़गड़ाहर. ! खुनाई दी । गाइीफी भाजज़ सुनकर सखंदसने जद्दी-ज्ददी अपने दाथोंका सादा सुड़ाया पीर दरवाज़ेसे बाहर निकल, उदय , उ्चककर भुप से छाठ हुई मालोंसे देखने लगा । उसने ऐग्ला' कि अप्सरायोकि समान चार-पाँच सुन्द्री छ़ियाँ मत्द्यतिसे ' झन्दिरिकी सीडियोंको फार करके भीतर था रही हैं ) इस छोटेसे दछकी खुखिया दी रमणियाँ थीं । जो सपसे बागे थी, उसकी अवस्पा उग-मग बीस चर्षच्ती थो भर उसव्यम -अत्वेद जद यौचनके उसारसे पूरा गठा 'हुआ शान रही 1 उसकी पुच्नीं बछककिशोरी थो । जो उसके पीछेगदि वह शिसेध शी फरती, [शही थी, उलकी अचस्या पन्‍्द्द-सोलहं थी 1. इन सब फारणों - इहाराजंकी घिरल, किन्दु शीतल लहरोंमें युण छे, फि घट अपनेस छवके पुत्र प्रमादघनव्दी नवोढ़ा स्री झुमुदूयी । इस प्रकार उत्मप्सं- 'मंलकक्शोरो ऐसे ज्ञा रही थी, जेखे कमीर परिज्च दिनसे फाम




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