चन्द्र गुप्त | Chandra Gupt

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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११ ९. इसी क्पिली-कानन में मैौव्यं लोग प्रयना दयता सस्य सतन्त्रता से संचालित करते थे, ओर ये छत्रिय ये, जता क्रि महावंश के इस अवतरण से सिद्ध होता है “मोरियानं खतियानं बंसजात सिरीधर । चंदगुत्तो सिपंज्जतं चागफो तरद्मणोत॒तो” दिन्दू नारककार विशाखदत्त ने चंद्रु दो. प्रायः वृपल कहकर सम्बोधित कराया है, इससे কক हिन्दू-हाल की मनोबृत्ति दी ध्वनित होती है। वस्तुतः दृपल शब्द से तो उनका झत्रिवत्त श्रीर भी प्रमाणित होता है, स्थो एनकैस्त क्रियालोपादिमाः सत्रियजातयः वृपलप्वं गतां लोके ब्राह्मएानामदशंनात्‌ । से यही मालूम द्ोता है कि जो क्षत्रिय लोग वेदिक क्रिथाश्रो से उदासीन हो जाते थे, उन्हें घार्मिक दृष्टि से वृपलत् प्राप्त होता था। वस्ठुतः वे जाति से ज्त्रिय थे | स्ववं अशोक मौच्य अपने को क्षत्रिय कहता था । यह प्रवाद भी अधिकता से प्रचलित है कि मौय्य-वंश मुरा नाम की शद्वा से चला है और चंद्रगुण्त उसका पुत्र था। यह भी कदा जानाः है कि चंद्रगुप्त मौय्य शूद्धा मुरा से उत्पन्न हुआ नन्‍द ही का पुत्र था | किन्तु ४. ७, इछक्राक्त लिखते हैं शछत11६ व5 एएधए8 ४107७ 7०४९016 1४९४ च6 वक 795098 ० 1190189 दधात 23817188 भए 6768 3796 00131780690 ४979 91000. तालव्य ्रि--यद अधिक संभव है कि नन्‍्दों और সীতা জা , कोई रक्त-सम्बन्ध न था “#ह््याप्रो1७ भी लिखते ईं--प%७ 15686907606 01 11070 ४1६6 10प7ए8 10986 30 358775)01% 68910050808 ০৫ 51080909700 9 0০ 1295 69 10690 00590. 2 2 শা এসিড




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