सत्यार्थ प्रकाश: | Satyarth Prakash

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथमसपुन्ञास श तद्धित करने से प्रा शप्द सिद्ध दोता दे । य प्ररप्टतया चघराध्चरस्प जगतों ध्यपद्दारं ज्ञानाति स प्रच् +प्रश पथ भाश जो निर्धान्त शानयुक्त सब चराइचर जगत के ध्ययददार को यधादन्‌ जानता दै इससे इंइ्यर फा नाम प्राह दै । इत्यादि नामाद मकार से युद्दीत दोते हैं । जैसे पक २ माघा से तीन २ अर्थ यहां ब्याष्यात किये हैं थैसे ही अन्य नामार्थ भी ऑओंकार से ज्ञाने जाते हैं। जो ( श्नो मित्र शै घण् | इस मन में मित्रादि नाम हैं वे भी परमेशर के हैं क्योंकि स्तुति मार्थना उपासना शेष दी करी की ज्ञाती दे । थेष्ठ उसको कदते हैं जो गुण कर्म स्पभाव आर सत्य सत्य ध्यदद्दारों में सप से अधिक दो । उन सब थे्टों में मी थो अत्यम्त थेप्ठ इसको परमेश्वर वद्दते दैं। शिसके तुल्य फोई न हुझा न दै श्रोर न दोगा । जब जुरप नददीं तो उससे धथिक फ्योंकर दो सकता दे झैसे परमेश्वर के सत्य स्याप दया सर्वेसामच्य ्रीर सर्वघवादि अनन्त पुण हैं थैसे अन्य किसी जड़ पदार्थ था शीय के मद्दों है जो पदार्थ सत्प दे उसके पुण कम्में स्वभाव भी सत्य होते हैं । इसलिये मनुष्यों को योग्य दि कि पग्मेश्वर दी की स्तुति प्रार्य ना पर उपासना करें उससे भिन्न की कमी न करें क्‍योंकि प्रह्मा घिष्णु मद्दादेप नामक पूदेज मद्दादाय विद्वान धृस्य दानयादि निरु्ट मजुष्य और झन्य साधारण मनुष्यों ने मी परमेश्वर ही में विश्यास करने अरसी करी स्तुति प्रार्थना झोर उपासना करी उससे भिन्न घरी नहीं की देखे इम सब को करना पाग्य दि । इसका विशेष वियार मुक्ति और उपासना दिपय में किया ज्ञापगा 1 ( प्रश्न ) मित्रादि नामों से सखा झौर इन्दादि देवों वे प्रसिद्ध ध्ययद्दार देयने से उन्दीं का प्रदण करना चादिये । ( उसर ) यद्ां उनका प्रण करना योग्य स्दीं क्योंकि जो मयुप्य छिसी का प्रिदर दि चद्दी अन्प का शत्रु और किस से उदासीन भी देखने में झाता दे । इससे सुख्यार्थ में सय्य शादि का प्रणु नद्दों दो सफता । किन्तु जेसा परमेश्वर सब शपत्‌ का मिद्चित मित्र न किसी का श्ु ऋर न किसी से उदासीन दै इससे मिश्न कोई भी जशीय इस प्रकार का कमी नहीं दो साला । इसलिये परमात्मा दी का प्रदण पदां दोता दि । दो | मोल अये में मित्रादि शप्द से खुदददादि मनुष्यों छा धइय दोता दे । ( भिमिदा स्नेइने ) इस धातु से ओणादिक लू प्रत्यय करने से मिश्र शब्द मिट होटा है। मेघति खिदयति सिदते था स मित्र? जो सब से स्नेद करके ओर सब फो पीलि इतने इस है इससे उस परंसवर का नाम सित्र दै। ( बूथ थरणे धर इंप्सापाम्‌ । इन धातुधों से रप दि उस भत्यय दोने से वर्ण शप्द सिद्ध दोना दि । यः सर्वान शिटान सुमुझन धर्माव्यनों बृरनप्येट व शिर्टैमुं मुचुभिर्धमात्ममिर्धियते बदले था स थरणः परमेश्वर शो अात्मपोगी विद्रात मुन्द ब हच्एा करने पाले मुल्य अर धर्मात्माधों का स्वीकार करता अथया सो शिएट सुमुद मुझ झट इनथर से प्रदश बिया जाता दै दर इंग्वर रण संशर्ष दे। अपपा यरणों गाम दर सं हलक परमेश्वर सब से थेप्ठ दि इसीछिये उसका नाम वर्ण दै । ( ऋ गतियापगरंद 2 ३ डा के नदटर प्रस्यय परने से दर्द शष्द सिद्ध दोत दि ओर ऋग्ये पूर्व ( माइ ्रे | इस डे बफिजा श्स्यय दोने से अपेया शम्द सिद्ध दोता दै। पोउ्यान प्वामिनों मटर की चरोति सोइदमा जो समय स्याद के कर नेदार सतुष्यों का मान्य इगेर पाद हट हुए इसकशण्ड कोर पुएव फलों का यधावत्‌ साय २ निपभकर्त दि इसी से बल एस्टेज्ट रथ (इदि परमिज्ययें । इस श्वातु से रन प्रत्यय चरने हो पस्ट्ू शब्द हद हट इदरेवान सबति सा इस्ट परमश्वर जा चलिल ऐश्पर्रयुर दि इसी से उः जि दूत श्दपूरवक (६1 ब्दाखि । इस धातु सर इति घत्पए दा दे हल इन टिक इन से यूदस्पति शप्द सिद ता दे + यो पुइतामाइयाईर इडि बसे की जो बड़ों से भी बढ़ा झोर बढ़े झाष्यशादि ध्रदाशों दा ब् है ल्ल्ट हि ्य द अर न्न् | दो




User Reviews

  • shreeramkabhakt

    at 2019-12-08 10:16:36
    Rated : 10 out of 10 stars.
    "धन्यवद् स्वामी दयानंद सरस्वती जी ??"
    इस पुस्तक ने मेरा जीवन परिवर्तन कर दिया और सही दिशा दिखा दी ।
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